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विश्लेषण डीलिमिटेशन: कांग्रेस का सबसे बड़ा डर क्यूँ ?

नई दिल्ली। लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाने वाले डीलिमिटेशन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में गरमाया हुआ है। कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दलों को इस प्रक्रिया का सबसे ज्यादा डर सताया हुआ है। कारण स्पष्ट है — 2009 में जब डीलिमिटेशन हुआ था, तो कांग्रेस को फायदा पहुंचा था, लेकिन आज की स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है।


इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो सहानुभूति की लहर आई, उसमें कांग्रेस की सीटें बहुत बढ़ीं। लगभग उतनी ही बढ़ोतरी 2009 के डीलिमिटेशन से कांग्रेस को मिली। उस समय भाजपा की मजबूत सामान्य श्रेणी की सीटों को आरक्षित श्रेणी में बदल दिया गया। जहां भाजपा जीत सकती थी, उन आरक्षित सीटों को भी टुकड़ों में बांट दिया गया। उदाहरण के तौर पर ठाणे की सीट, जो शिवसेना का गढ़ थी और जहां 32 लाख मतदाता थे, उसे चार सीटों में विभाजित कर दिया गया। नतीजा? तीन सीटें कांग्रेस ने जीत लीं।

आज स्थिति उलट है। केंद्र और राज्यों दोनों स्तर पर भाजपा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। ऐसे में डीलिमिटेशन भाजपा की सीटों में बड़ी छलांग साबित होगा। यही वजह है कि कांग्रेस लगातार इसका विरोध कर रही है। उन्हें पता है कि उन्होंने जो खेल 2009 में खेला था, आज भाजपा उससे कहीं ज्यादा ताकतवर है।

महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन का गठजोड़ :
2023 में महिला आरक्षण विधेयक पेश होने पर शुरू में किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन जब गृह मंत्री अमित शाह ने इसे डीलिमिटेशन से जोड़कर पेश किया, तो कांग्रेस और खासकर दक्षिण भारत की पार्टियों — सबसे ज्यादा DMK — ने तीखा विरोध शुरू कर दिया। सदन में गृह मंत्री ने कहा कि अगर संख्या को लेकर आशंका है तो तीन-चार घंटे का समय दें, बिल में संशोधन करके लिखित आश्वासन दे देते हैं। लेकिन उस समय DMK और कांग्रेस का बुखार चढ़ा हुआ था।

अब स्थिति बदल चुकी है। DMK का बुखार उतर गया है और कांग्रेस का साथ छूट गया है। DMK अब कांग्रेस के विरोध वाले मुद्दों का समर्थन करने की राह पर है। TMC की हालत तो और भी खराब है। एक समय की मजबूत पार्टी अब टुकड़ों में बंट चुकी है — कुछ यहां गिरे, कुछ वहां। आरोप तो यही लगता था कि TMC भाजपा की ‘बी-टीम’ बन गई है, और अब यह कागज पर भी साबित होने वाला है।

दो-तिहाई बहुमत का गणित :
दो-तिहाई बहुमत के लिए लोकसभा में 363 और राज्यसभा में 163 सीटों की जरूरत होती है। डीलिमिटेशन के बाद भाजपा इस लक्ष्य के और करीब पहुंच सकती है। रेड्डी साहब द्वारा कही गई बातें अब सही साबित होती दिख रही हैं। जब बिल आएगा, तो DMK और अन्य दलों का समर्थन मिलना तय माना जा रहा है।

डीलिमिटेशन केवल सीटों का पुनर्निर्धारण नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वास्तविक ताकत को जनसंख्या के अनुपात में लाने की प्रक्रिया है। कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दल इसे अपनी सियासी हार के रूप में देख रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय हित और समान प्रतिनिधित्व के लिए यह जरूरी कदम है। भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत के साथ डीलिमिटेशन न सिर्फ उसकी सीटों में इजाफा करेगा, बल्कि देश की राजनीति को नई दिशा भी देगा।