नई दिल्ली। 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश मामले में आरोपी शरजील इमाम, जिसने कथित तौर पर 'चिकन नेक' काटने की धमकी दी थी, ने एक बार फिर नियमित जमानत के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कड़कड़डूमा कोर्ट ने शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 4 जुलाई 2026 को तय की गई है।
शरजील इमाम ने यह अपनी दूसरी नियमित जमानत याचिका दाखिल की है। इससे पहले 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। अब नई याचिका में इसके वकील अहमद इब्राहिम ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल पिछले छह साल से जेल में बंद हैं। आरोप तय करने की बहस भी अभी तक पूरी नहीं हुई है, जिससे मुकदमे के जल्द खत्म होने की कोई संभावना नहीं दिख रही। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी को जमानत का आधार बनाया गया है।
दिल्ली दंगों में 53 निर्दोष हिंदुओं की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। शरजील इमाम पर आरोप है कि वह CAA-NRC विरोध के नाम पर भड़काऊ भाषण देकर दंगों की साजिश में शामिल था। उसके भाषणों में हिंदू विरोधी भावना साफ झलकती थी। ऐसे व्यक्ति को जमानत मिलना देश की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाता है।
शरजील इमाम का विवादास्पद इतिहास :
शरजील इमाम 2020 के दंगों से पहले CAA-NRC के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय था। उसने कथित तौर पर कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो असम और बंगाल के बीच 'चिकन नेक' इलाके को काट दिया जाएगा, जो देश की एकता के लिए खतरा था। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में उसे साजिश का प्रमुख आरोपी माना गया है। UAPA के तहत दर्ज इस मामले में सबूतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले जमानत देने से इनकार किया था।
फिर भी शरजील बार-बार जमानत की गुहार लगा रहा है। इससे पहले मार्च 2026 में उसे भाई की शादी के लिए अंतरिम जमानत मिली थी, जिसके बाद वह गांव लौटा। अब नियमित जमानत की मांग कर रहा है। उमर खालिद के साथ मिलकर इन पर बड़े पैमाने पर साजिश रचने का आरोप है, जिसमें विदेशी फंडिंग और संगठित हिंसा शामिल थी।
न्याय की प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा :
कई मामलों में देखा गया है कि UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत आरोपी लंबे समय तक जेल में रहते हैं क्योंकि सबूत इकट्ठा करने में समय लगता है। दिल्ली पुलिस अब कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करेगी। कोर्ट को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि साजिश के मुख्य आरोपी को जमानत देकर दंगों की जांच को कमजोर न किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों में लंबी हिरासत को आधार बनाया जा रहा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और पीड़ितों के न्याय को प्राथमिकता देनी चाहिए।
राजनीतिक संदर्भ :
यह मामला उस वक्त सामने आया है जब देश में CAA-NRC जैसे मुद्दों पर फिर बहस हो रही है। विपक्षी दलों और कुछ वामपंथी संगठनों द्वारा ऐसे आरोपियों का समर्थन किया जाता रहा है, जो हिंदू समाज के लिए चिंता का विषय है। शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों की रिहाई से कानून व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।भारतीय जनता पार्टी (BJP) और हिंदुत्ववादी संगठन लंबे समय से ऐसे मामलों में सख्ती की मांग करते रहे हैं। UCC और मजबूत कानून व्यवस्था की जरूरत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

