महारानी गायत्री देवी, जयपुर के राजघराने की एक ऐसी शख्सियत थीं, जिनकी सुंदरता और गरिमा ने उन्हें न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में सम्मानित किया। वे एक प्रभावशाली सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ भी थीं। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने समाज में अनेक सुधार किए और देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।
इंदिरा गांधी: तानाशाही और सत्ता का दुरुपयोग :
इंदिरा गांधी, भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री, जिनकी नीतियों और कार्यों ने देश के राजनीतिक परिदृश्य को व्यापक रूप से प्रभावित किया। उनकी नेतृत्व क्षमता की जितनी प्रशंसा होती है, उतनी ही आलोचना भी उनके तानाशाही प्रवृत्तियों और सत्ता के दुरुपयोग के लिए होती है। आपातकाल (1975-1977) के दौरान उनकी नीतियों ने कई विवादों को जन्म दिया।
गायत्री देवी की गिरफ्तारी: एक राजनीतिक साजिश :
आपातकाल के दौरान, इंदिरा गांधी ने कई राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया। महारानी गायत्री देवी और उनके भाई भवानी सिंह को वित्तीय कानूनों के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया।
जेल की भयावह परिस्थितियाँ :
महारानी गायत्री देवी को एक ऐसे कमरे में रखा गया, जहां पर्याप्त जगह नहीं थी और शौचालय के नाम पर केवल एक गड्ढा था। उन्हें यौनकर्मियों और गंदी परिस्थितियों में रखा गया, जहाँ उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ी।
आत्मसमर्पण :
इंदिरा गांधी के आदेश पर, महारानी को तब तक रिहा नहीं किया गया जब तक उन्होंने लिखित रूप में यह नहीं स्वीकारा कि वे आपातकाल का समर्थन करती हैं और राजनीति से संन्यास ले रही हैं। इस जबरदस्ती के बाद ही उन्हें रिहाई मिली।
राजघराने की संपत्ति की लूट :
इंदिरा गांधी के आदेश पर सेना के कई ट्रक जयपुर भेजकर राजघराने की संपत्ति को लूट लिया गया। यह घटना सत्ता के दुरुपयोग और व्यक्तिगत प्रतिशोध का एक स्पष्ट उदाहरण है।
निष्कर्ष: एक लोकतंत्र का दाग
महारानी गायत्री देवी और इंदिरा गांधी की यह कहानी भारतीय राजनीति के एक काले अध्याय को उजागर करती है। यह दर्शाता है कि कैसे सत्ता का दुरुपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए किया जा सकता है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान हुए इन घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र की मूल्यों को गहरा धक्का पहुँचाया।
सवाल और विचार : आज भी कई लोग गांधी परिवार का समर्थन करते हैं, लेकिन इतिहास के इन काले अध्यायों को याद रखना और उनसे सीख लेना जरूरी है। यह घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि सत्ता और राजनीति का सही उपयोग कैसे किया जाए और लोकतंत्र के मूल्यों को कैसे संरक्षित रखा जाए।

