शेख अब्दुल्ला, जिन्हें 'शेर-ए-कश्मीर' के नाम से भी जाना जाता है, जम्मू-कश्मीर के एक प्रमुख राजनीतिक नेता थे। उनके हज यात्रा के पीछे छुपे रहस्य और विवादों ने भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस लेख में हम शेख अब्दुल्ला की हज यात्रा के वास्तविक उद्देश्यों और इसके प्रभावों की विस्तार से चर्चा करेंगे।
हज यात्रा का वास्तविक उद्देश्य :
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद, शेख अब्दुल्ला ने भारत सरकार से हज यात्रा पर जाने की इजाजत मांगी। लेकिन उनकी वास्तविक योजना केवल धार्मिक यात्रा नहीं थी। उनकी असली मंशा जम्मू-कश्मीर के विभाजन के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना थी। उन्होंने नवम्बर 1964 में यात्रा के लिए वीजा आवेदन किया और भारत सरकार ने उन्हें सात महीने का वीजा दे दिया, जिसमें सऊदी अरब, इराक, ईरान, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, लेबनान, अफगानिस्तान, अल्जीरिया, ब्रिटेन, तुर्की, रूस और यूरोप के सभी देशों में यात्रा की अनुमति शामिल थी।
नागरिकता विवाद :
शेख अब्दुल्ला ने वीजा फॉर्म में अपनी नागरिकता कश्मीरी मुसलमान लिखी थी, जो भारत सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। यह बात जानबूझकर नजरंदाज की गई, और विरोध होने पर विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने इस पर टिप्पणी की कि अगर शेख पाकिस्तान की नागरिकता लेते हैं, तो भारत सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। यह एक गैर जिम्मेदाराना बयान था क्योंकि शेख भारत के एक राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री थे और उन्हें भारतीय नागरिकता लिखनी चाहिए थी।
विदेश में भारत विरोधी प्रचार :
शेख अब्दुल्ला की भारत विरोधी गतिविधियों की जानकारी सरकार को थी। उनकी यात्रा के दौरान, उन्होंने कई सार्वजनिक भाषणों और मीडिया संबोधनों में भारत का विरोध किया। शेख अब्दुल्ला ने अपने विदेशी दौरों की शुरुआत जेद्दाह से की, जहां स्थानीय नागरिकों को उनके समर्थन में जुटाने का काम पाकिस्तान दूतावास ने किया। लंदन में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में भी पाकिस्तान दूतावास ने भूमिका निभाई। ब्रिटेन के कश्मीरी मुसलमानों ने शेख को 32,000 पाउंड स्टर्लिंग भी एकत्र करके दिए, जिसके बदले में उन्होंने स्वतंत्र कश्मीर सरकार की घोषणा का आश्वासन दिया।
चीन के साथ संबंध :
जब शेख कायरों में थे, चीन के विदेश मंत्री पाकिस्तान के दौरे पर थे। जुल्फिकार अली भुट्टों ने उन्हें रात्रि भोजन पर बुलाया, जहां चीन के विदेश मंत्री ने खुलासा किया कि चीन सरकार ने शेख को चीन आने का निमंत्रण भेजा है। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने दावा किया कि वे शेख को चीन नहीं जाने देंगे। लेकिन शेख ने अल्जियर्स में चीन के राष्ट्रपति से मिलने की अपनी इच्छा जाहिर की और अंततः उनसे मुलाकात की।
भारत सरकार की प्रतिक्रिया :
शेख अब्दुल्ला की गतिविधियों से परेशान होकर भारत सरकार ने आखिरकार उन्हें गिरफ्तार कर लिया। शेख को तमिलनाडु में नजरबंद रखा गया। केंद्र सरकार ने 10 मई, 1965 को घोषणा की कि शेख को भारत की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गिरफ्तार किया गया है। लेकिन बाद में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया। इसके बाद, शेख श्रीनगर लौट आए और फिर से भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो गए।
हमारा निष्कर्ष :
शेख अब्दुल्ला की हज यात्रा का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि इसमें राजनीतिक और रणनीतिक योजनाएं भी शामिल थीं। उनकी गतिविधियों ने भारतीय राजनीति में गंभीर विवाद उत्पन्न किए और यह स्पष्ट किया कि उनकी मंशा केवल धार्मिक यात्रा की नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के विभाजन और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की थी। इस पूरे प्रकरण ने भारतीय राजनीति में गहरा प्रभाव डाला और आज भी यह एक विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है।

