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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कन्याकुमारी यात्रा: विवेकानंद शिला स्मारक की साधना और राष्ट्रीय एकता का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु के कन्याकुमारी स्थित ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ पर अपनी साधना शुरू कर दी है। यह यात्रा न केवल उनकी आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानंद के विचारों को पुनर्स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है। इस लेख में, हम प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के विभिन्न पहलुओं, विवेकानंद शिला स्मारक के इतिहास, और इसके निर्माण की प्रेरणा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

मोदी की कन्याकुमारी यात्रा का उद्देश्य :
1.चुनावी प्रचार का समापन और साधना की शुरुआत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7वें चरण के चुनाव के लिए प्रचार-प्रसार का शोर थमने के बाद कन्याकुमारी के लिए प्रस्थान किया। यह 2 दिवसीय कार्यक्रम है जिसमें उन्होंने भगवती अम्मन मंदिर में दर्शन किया और विवेकानंद शिला स्मारक पर साधना शुरू की। यह स्थल बंगाल की खाड़ी, हिन्द महासागर और अरब सागर के संगम पर स्थित है, जो भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर है। पीएम मोदी की यह यात्रा न केवल उनकी आध्यात्मिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है, बल्कि राष्ट्रीय एकता का भी संदेश देती है।

2.स्वामी विवेकानंद के विचारों का पुनर्स्मरण
स्वामी विवेकानंद, जो पश्चिम बंगाल में जन्मे थे, ने कन्याकुमारी में तपस्या के दौरान अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त किया था। प्रधानमंत्री मोदी के इस यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय एकता का सन्देश देना है, जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में किया था। यह यात्रा विवेकानंद के जीवन और उनके आदर्शों को सम्मान देने का एक महत्वपूर्ण कदम है।

विवेकानंद शिला स्मारक: इतिहास और निर्माण की गाथा :
1.स्मारक की स्थापना का प्रारंभिक विचार
विवेकानंद शिला स्मारक का निर्माण एकनाथ रानडे द्वारा किया गया था, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह रहे थे। जब स्वामी विवेकानंद की जन्म-शताब्दी मनाने की तैयारी हो रही थी, तब तमिलनाडु में RSS के प्रांत-प्रचारक दत्ताजी डिडोलकर और उनके स्वयंसेवकों ने विवेकानंद शिला की चर्चा छेड़ी थी। स्वामी विवेकानंद ने इस शिला पर तीन दिनों तक साधना की थी, जिसके बाद उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य मिला।

2.निर्माण के प्रारंभिक कदम
स्वामी विवेकानंद की साधना स्थल पर स्मारक बनाने का विचार काफी संघर्षपूर्ण था, खासकर ईसाइयों के गढ़ में। राज्य स्तरीय समिति को राष्ट्रीय समिति बनाने के लिए एकनाथ रानडे को जोड़ा गया, जिन्होंने इस परियोजना को अपनी जीवन का उद्देश्य बना लिया। उन्होंने 300 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपे, जिसके बाद तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम से बात की गई।

3.परियोजना की चुनौतियाँ और समर्पण
एकनाथ रानडे ने इस परियोजना के लिए अपनी जान लगा दी। उन्होंने स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों को स्वामीजी के बारे में पढ़ने के लिए कहा, ताकि वे तन-मन से काम कर सकें और परिणाम सटीक हो। इस परियोजना में राज्य और केंद्र सरकार के अलावा आम जनता का भी बहुत बड़ा योगदान था। आम लोगों से एक रुपए, दो रुपए और पांच रुपए के दान से इस स्मारक का निर्माण हुआ।

स्मारक का उद्घाटन और महत्त्व :
1.निर्माण की पूरी गाथा
विवेकानंद शिला स्मारक का निर्माण कार्य नवंबर 1964 में शुरू हुआ और 1970 में पूरा हुआ। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M करूणानिधि ने इसका उद्घाटन किया। इस परियोजना पर 1.35 करोड़ रुपए का खर्च आया, जिसमें से 80 लाख रुपए आम लोगों के दान से इकट्ठे किए गए थे। इसमें राज्य और केंद्र सरकार के अलावा भारतीय सेना के जवानों ने भी योगदान दिया।

2.प्रतिमा का निर्माण
स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा बनाने का कार्य चेन्नई के गाँधी स्टेचू और मरीना बीच पर लेबर स्टेचू बनाने वाले DP रॉय चौधरी ने किया। अंत में सोनवडेकर द्वारा बनाई गई प्रतिमा का चयन हुआ। स्मारक में आज 110 एकड़ में विवेकानदंपुरम भी है, जो स्वामी विवेकानंद की विचारधारा को समर्पित है।

राष्ट्रीय एकता का संदेश :
1.एकता यात्रा: 1991 की यादें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 33 वर्ष पूर्व 1991 में भी इस स्थल का दौरा किया था, जब मुरली मनोहर जोशी ने ‘एकता यात्रा’ निकाली थी। इस यात्रा का उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय एकता का संदेश देना था। 14 राज्यों से होकर गुजरी यह यात्रा 26 जनवरी, 1992 को कश्मीर के श्रीनगर स्थित लाल चौक पर बलिदानी भगत सिंह के परिजनों द्वारा राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराने के साथ खत्म हुई थी।

2.विवेकानंद की विचारधारा और आज का भारत
स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में राष्ट्रीय एकता और भारत माता की सेवा का संदेश दिया था। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और प्रधानमंत्री मोदी का कन्याकुमारी यात्रा इस बात का प्रतीक है कि उनके विचारों को आज भी सम्मान दिया जा रहा है। इस यात्रा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानंद के विचारों को पुनः जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है।

हमारा निष्कर्ष :
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कन्याकुमारी यात्रा न केवल उनकी आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानंद के विचारों को पुनर्स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है। विवेकानंद शिला स्मारक का निर्माण और इसके पीछे की कहानी हमें यह सिखाती है कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक धरोहर का महत्व कितना महत्वपूर्ण है। इस यात्रा के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर से यह साबित किया है कि स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और उन्हें सम्मान दिया जाना चाहिए।