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विवेकानन्द रॉक स्मारक: संघर्ष और संकल्प की कहानी

1962 में कन्याकुमारी में विवेकानन्द रॉक पर स्मारक बनाने का प्रयास हुआ। इसका विरोध स्थानीय कैथोलिक मछुआरों ने किया, जिन्होंने चट्टान को सैंट ज़ेवियर रॉक कहा और वहाँ एक बड़ा क्रॉस लगा दिया। इसके बाद विवेकानन्द समर्थकों और सरकार के बीच संघर्ष चला। विवेकानन्द मेमोरियल रॉक मिशन के प्रमुख एकनाथ रानाडे ने व्यापक समर्थन जुटाया और अंततः स्मारक बनवाया। इस स्मारक का निर्माण हिंदुओं के दान से हुआ और 7 जनवरी 1972 को इसका उद्घाटन हुआ।

प्रारंभिक विवाद :
1962 में विवेकानन्द की जन्मशती के अवसर पर कन्याकुमारी में एक समिति ने विवेकानन्द रॉक पर स्मारक बनाने की योजना बनाई। स्थानीय कैथोलिक मछुआरों ने इसका विरोध किया और चट्टान पर एक बड़ा क्रॉस लगा दिया, जिसे हिंदू समुदाय ने अस्वीकार किया।राज्य सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए और चट्टान को विवेकानन्द रॉक घोषित किया। क्रॉस हटाए जाने के बाद भी विवाद जारी रहा। मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम ने चट्टान को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया और केंद्र सरकार ने मामले को हाथ में लिया।

एकनाथ रानाडे का प्रयास :
एकनाथ रानाडे ने विवेकानन्द मेमोरियल रॉक मिशन की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने सांसदों से समर्थन जुटाया और केंद्र सरकार को विवेकानन्द रॉक पर स्मारक बनाने के लिए राजी किया। राज्य सरकार ने अंततः स्मारक की अनुमति दी, लेकिन सीमित आकार में। कांची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु श्री चंद्रशेखर सरस्वती महास्वमिंगल के समर्थन से स्मारक का आकार बढ़ाया गया। एकनाथ रानाडे ने हिंदुओं से एक-एक रुपये का चंदा एकत्र किया और स्मारक निर्माण के लिए धन जुटाया।

स्मारक का उद्घाटन :
स्वामी विवेकानन्द की 108वीं जयंती पर 7 जनवरी 1972 को विवेकानन्द रॉक स्मारक का उद्घाटन हुआ और विवेकानन्द केंद्र की स्थापना की घोषणा की गई। इस संघर्ष की कहानी हमारे पूर्वजों के संकल्प और संघर्ष की प्रतीक है।