भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उदय और सत्ता पर उनके पकड़ को चुनौती देने के लिए एक व्यापक विपक्षी गठबंधन उभरा है, जिसे आमतौर पर "एंटी मोदी स्क्वॉड" के नाम से जाना जाता है। इस समूह में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की एक टोली शामिल है, जो मोदी और उनकी नीतियों का विरोध करती है। लेकिन क्या यह विरोध वास्तविक मुद्दों पर आधारित है, या यह मात्र व्यक्तिगत और राजनीतिक विरोधाभासों का परिणाम है? इस लेख में हम दो प्रमुख उदाहरणों के माध्यम से एंटी मोदी स्क्वॉड की रणनीतियों और उनके प्रभाव का विश्लेषण करेंगे।
पंद्रह लाख का वादा: एक मिथक या वास्तविकता?
2014 के चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा था कि विदेशों में जमा काला धन इतना अधिक है कि अगर उसे वापस लाया जाए तो प्रत्येक भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रुपए आ सकते हैं। यह बयान एक काल्पनिक आकलन के रूप में दिया गया था, न कि वास्तविक वादा। लेकिन एंटी मोदी स्क्वॉड ने इसे एक वादा मानकर बार-बार उठाया और प्रचारित किया।
सच्चाई और भ्रम :
मोदी के बयान को समझने में विफलता का परिणाम यह हुआ कि यह मुद्दा एक मिथक बन गया। आज भी, दस साल बाद, इस मिथक का अनुसरण किया जा रहा है। एंटी मोदी स्क्वॉड के सदस्य इसे एक प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि अगर मेहनत और समर्पण से काम किया जाए तो कोई भी व्यक्ति अपने खाते में पंद्रह लाख से अधिक जमा कर सकता है।
अमित शाह का जुमला :
अमित शाह ने इस बयान को एक "जुमला" कहकर विरोधियों को एक और मौका दिया। उन्होंने कहा कि यह मात्र एक चुनावी बयान था। एंटी मोदी स्क्वॉड ने इस टिप्पणी को भी तुरंत पकड़ लिया और इसे अपने नैरेटिव में शामिल कर लिया। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे विरोधी पक्ष हर छोटी से छोटी बात को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करता है।
महात्मा गांधी और फिल्म का विवाद :
एक और उदाहरण तब सामने आया जब नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा कि "गांधी" फिल्म के कारण दुनिया ने महात्मा गांधी को बेहतर तरीके से जाना। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या हम भारतीय इस काम को पहले नहीं कर सकते थे। मोदी के बयान का मतलब यह था कि भारतीय फिल्म निर्माताओं को महात्मा गांधी पर फिल्म बनाने का प्रयास पहले करना चाहिए था, ताकि दुनिया गांधी को हमारे दृष्टिकोण से जान सके। लेकिन एंटी मोदी स्क्वॉड ने इस बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया और यह प्रचारित किया कि मोदी ने कहा है कि फिल्म नहीं बनती तो गांधी को कोई नहीं जानता।
प्रतिक्रिया और वास्तविकता :
इस प्रकार के बयान और उन पर की गई प्रतिक्रियाएँ एंटी मोदी स्क्वॉड के दृष्टिकोण की गंभीरता को दर्शाती हैं। यह दिखाता है कि कैसे यह समूह छोटी-छोटी बातों को बड़े विवाद में बदलने की क्षमता रखता है। लेकिन यह भी साफ है कि यह रणनीति मतदाताओं को आकर्षित करने में असफल रही है।
एंटी मोदी स्क्वॉड की रणनीति: क्या यह सफल है?
एंटी मोदी स्क्वॉड के इन दोनों उदाहरणों से स्पष्ट है कि इस समूह की रणनीति का मुख्य आधार मोदी के बयानों और नीतियों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना है। यह रणनीति कितनी प्रभावी है, यह एक बड़ा सवाल है। पिछले दस सालों में यह स्पष्ट हो चुका है कि मतदाता इस प्रकार की राजनीति को समझ चुके हैं और इसे गंभीरता से नहीं लेते।
हमारा निष्कर्ष :
एंटी मोदी स्क्वॉड की रणनीतियाँ और उनकी कार्यप्रणाली भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे किस हद तक वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं और व्यक्तिगत हमलों से बच सकते हैं। मोदी के विरोध में उठाए गए इन दो उदाहरणों से यह साफ हो जाता है कि सिर्फ आलोचना करने से कुछ नहीं होता, बल्कि ठोस और सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाना अधिक महत्वपूर्ण है। केवल समय ही बताएगा कि एंटी मोदी स्क्वॉड अपनी रणनीतियों में कितना बदलाव लाएगा और वह भारतीय राजनीति में कितनी प्रभावी साबित होगी।
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