अमीरों के बच्चों को मिलती रियायतें :हाल ही में पुणे के किशोर न्यायालय के जज एल एन दानवाडे ने एक उच्च प्रोफ़ाइल केस में अमीर बाप के बेटे वेदांत अग्रवाल को 24-24 साल के दो आईटी प्रोफेशनल्स की हत्या के मामले में तुरंत जमानत दे दी। इस निर्णय ने जनता में आक्रोश पैदा कर दिया है। वेदांत ने बिना पंजीकरण की नई विदेशी कार और बिना ड्राइविंग लाइसेंस के दो व्यक्तियों को कुचलकर उनकी जान ले ली।
जज दानवाडे ने वेदांत को मामूली सजा दी, जिसमें 300 शब्द का निबंध लिखना, ट्रैफिक पुलिस के साथ 15 दिन काम करना, डॉक्टर की सलाह से शराब छुड़वाने के उपाय करना, और मनोवैज्ञानिक से काउंसलिंग कराना शामिल था। यह सजा न केवल हल्की थी, बल्कि इसे देखते हुए न्यायपालिका की संवेदनहीनता भी उजागर होती है।
न्यायपालिका की संवेदनहीनता :
यह स्पष्ट है कि जज एल एन दानवाडे ने इस निर्णय में मानवीय संवेदनाओं का अभाव दिखाया। वेदांत अग्रवाल का अपराध गंभीर था, लेकिन सजा इतनी मामूली दी गई कि यह न्याय का मखौल बन गया। बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की तरफ से इस मामले पर कोई सख्त कदम नहीं उठाए गए, जिससे जनता में यह संदेश गया कि अमीरों के लिए कानून अलग है।
मोटर वेहिकल एक्ट 2019 और इसकी कमियाँ :
2020 के मोटर वेहिकल एक्ट में पहली बार नाबालिगों द्वारा किए गए ट्रैफिक अपराधों के लिए उनके अभिभावकों के लिए सजा का प्रावधान किया गया था। हालांकि, इस केस में वेदांत के पिता विशाल अग्रवाल पर सही धाराओं में केस दर्ज नहीं किया गया।
विशाल अग्रवाल पर मोटर वेहिकल अमेंडमेंट एक्ट 2019 के सेक्शन 199 में केस दर्ज हुआ, जिसमें प्रावधान है कि नाबालिग के मोटर वेहिकल संबंधित अपराध के लिए उसके अभिभावक दोषी माने जाएंगे और उन पर 3 साल की सजा और 25000 रुपए का जुर्माना हो सकता है। यह सजा नाकाफी है, विशेष रूप से इस केस में जहां दो व्यक्तियों की हत्या हुई है।
नाबालिग को शराब बेचने वालों के लिए सजा :
नाबालिग को शराब बेचने वालों के लिए भी 7 साल की सजा का प्रावधान है, लेकिन सच्चाई यह है कि अमीरों के बिगड़ैल बच्चे जब शराब मांगते हैं तो बाप की धौंस के आगे सभी नतमस्तक हो जाते हैं। इस मामले में भी यही हुआ, जिससे साफ होता है कि कानून के लागू करने में भी भेदभाव होता है।
निष्कर्ष :
इस केस ने न्यायपालिका की संवेदनहीनता और कानून के प्रति उसके रवैये को उजागर कर दिया है। यह स्पष्ट है कि न्यायालय के कुछ जजों में अपराधियों के प्रति सहानुभूति होती है, लेकिन पीड़ितों के प्रति नहीं। जब तक न्यायपालिका में यह रवैया रहेगा, तब तक आम जनता को न्याय मिलना कठिन रहेगा। इस मामले में जज एल एन दानवाडे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में इस प्रकार के निर्णय न हों और न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास बना रहे।

