सुरेश पंडिता और सीमा की त्रासदी उन कड़वे अनुभवों का प्रतीक है, जो भारत और उसके पड़ोसी देशों में हिन्दू समुदाय ने झेले हैं। इस लेख के माध्यम से हम उनके दर्द और संघर्ष को समझने की कोशिश करेंगे, और यह जानने का प्रयास करेंगे कि क्यों कुछ लोग कश्मीरी हिन्दू होने को पाप समझते हैं।
1. कश्मीर में हिन्दू समुदाय का पलायन
सुरेश पंडिता की कहानी का आरंभ कश्मीर से होता है। 1989 में आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को धमकाया और उनके घरों पर हमला किया। स्थानीय मस्जिदों से उन्हें धमकियाँ दी गईं और उन्हें भाग जाने को कहा गया।
कश्मीर में धार्मिक उन्माद: कश्मीर में हिन्दू और मुस्लिम समुदाय लंबे समय तक साथ-साथ रहे थे। सुरेश के पिता ने गीता और कुरान शरीफ दोनों को अपने घर में रखा था, और वे हिन्दू-मुस्लिम एकता में विश्वास रखते थे। इसके बावजूद, धार्मिक उन्माद के चलते सुरेश का परिवार अपने घर से बेदखल हुआ और उनकी संपत्ति नष्ट हो गई।
2. बांग्लादेश बॉर्डर पर घुसपैठ
सुरेश की ड्यूटी बांग्लादेश बॉर्डर पर लगी, जहाँ उसने घुसपैठियों को रोकने की कोशिश की। इस दौरान उसे चार सोने के कंगन मिले, जिनके पीछे एक दर्दनाक कहानियां छिपी थी। बॉर्डर पर हिन्दू परिवारों को सुरक्षा की तलाश में भागना पड़ता है। सीमा पार करने की कोशिश करते समय उनकी संपत्ति और पहचान छूट जाती है, और वे अपने नए जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।
3. बनारस में संकट मोचन मंदिर पर हमला :
बनारस में सुरेश की ड्यूटी के दौरान संकट मोचन मंदिर पर बम धमाका हुआ। इस हमले में सैकड़ों लोग मारे गए और सुरेश गंभीर रूप से घायल हुआ। हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण स्थलों पर आतंकवादी हमले होते हैं, जो हिन्दू समुदाय को गहरे सदमे में डालते हैं। यह घटनाएं न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करती हैं, बल्कि उनके धार्मिक स्वतंत्रता पर भी हमला होता है।
4. बांग्लादेश से पलायन और सीमा की कहानी :
सीमा की कहानी बांग्लादेश में हिन्दू परिवारों की दुर्दशा को बयां करती है। 2002 के गुजरात दंगों की आंच बांग्लादेश तक पहुँची, और वहाँ के मुस्लिम गुंडों ने हिन्दू परिवारों पर हमला किया।
बांग्लादेश में हिन्दू विरोध: बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय को धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। हिन्दू परिवारों को अपनी सुरक्षा के लिए देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है, और वे अपनी संपत्ति और परिवार को खो देते हैं।
5. सीएए और एनआरसी का विरोध :
कहानी का अंत इस सवाल से होता है: "क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है?" यह सवाल उन लोगों के लिए है जो नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) का विरोध करते हैं।
सीएए और एनआरसी: सीएए और एनआरसी का उद्देश्य भारत में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करना है। इसके विरोध में कुछ लोग यह कहते हैं कि यह कानून धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देता है।
हमारी राय :
सुरेश और सीमा की आपबीती हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हिन्दू समुदाय को किस प्रकार से धार्मिक उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ता है। उनके अनुभव यह सवाल उठाते हैं कि क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है। यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि हमें एक-दूसरे के धर्म और मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए, और एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।

