Default Image

Months format

View all

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

404

Sorry, the page you were looking for in this blog does not exist. Back Home

Ads Area

बांग्लादेशी घुसपैठियों का तमाशा – डिपोर्टेशन का मजाक, भारत की सुरक्षा का सवाल

लिटन शोहिद मुल्ला और पापी बेगम, एक बांग्लादेशी दंपति, जो भारत में अवैध रूप से रह रहे थे। जुलाई 2025 में मुंबई से इनकी गिरफ्तारी हुई और इन्हें बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया गया। लेकिन एक साल से भी कम समय में ये दोनों फिर से अवैध तरीके से भारत में घुस आए और अब एक बार फिर मुंबई में गिरफ्तार किए गए हैं। इन्हें दोबारा डिपोर्ट करने की तैयारी चल रही है।


यह घटना सिर्फ एक जोड़े की कहानी नहीं है। यह भारत की सीमा सुरक्षा और प्रवासन नीति की बड़ी खामी को उजागर करती है। ऐसे अनगिनत बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं जो डिपोर्ट होने के बाद भी महीनों के अंदर वापस भारत में घुस जाते हैं। हमारे सिस्टम से इन्हें कोई डर नहीं है। वे जानते हैं कि सीमा पार करना आसान है, पकड़े जाने पर बस कुछ समय जेल में बिताना है और फिर नया मौका मिल जाएगा।

यह स्थिति चिंताजनक है। अवैध घुसपैठ न सिर्फ रोजगार, संसाधनों और कानून-व्यवस्था पर बोझ बढ़ाती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा बन जाती है। कई मामलों में ऐसे घुसपैठिए जाली दस्तावेज बनाकर वोटर कार्ड, आधार और राशन कार्ड तक हासिल कर लेते हैं। इससे लोकतंत्र की जड़ें हिलती हैं और आंतरिक सुरक्षा पर सवाल उठते हैं। बंगाल, बिहार, असम, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।

डिपोर्टेशन का क्या मूल्य है अगर डिपोर्ट किए गए लोग आसानी से वापस लौट सकते हैं? वर्तमान सिस्टम में न तो पर्याप्त निगरानी है, न ही कड़ी सजा का प्रावधान। सीमा पर बाड़बंदी, ड्रोन निगरानी और फिंगरप्रिंट-बायोमेट्रिक डेटाबेस को मजबूत करना जरूरी है। डिपोर्टेशन के बाद पांच या दस साल की जेल सजा और भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। बार-बार घुसपैठ करने वालों पर स्थायी प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाना होगा। भारत को अब “घुसपैठियों का स्वर्ग” नहीं बनने देना चाहिए। मजबूत कानून, तेज अदालती प्रक्रिया और राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही इस समस्या का समाधान संभव है।