संक्षेप: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु के कन्याकुमारी स्थित ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ पर 45 घंटों की साधना में व्यस्त हैं। इस दौरान उन्होंने भगवा वस्त्र धारण किया, उदय हो रहे भगवान भास्कर को जल अर्पित किया और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के सामने ओंकार के नाद के बीच ध्यान किया। इस साधना के दौरान उन्होंने माला से जाप भी किया। कन्याकुमारी का सूर्योदय और सूर्यास्त दृश्य बड़ा मनमोहक होता है।
विवेकानंद शिला स्मारक का ऐतिहासिक महत्व :
1.कन्याकुमारी का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व
कन्याकुमारी, भारत के सुदूर दक्षिण हिस्से में स्थित, एक पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल है। यह वही स्थान है, जहाँ माँ कन्याकुमारी ने तपस्या की थी और जहाँ स्वामी विवेकानंद को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह स्थान अपने सुंदर सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य के लिए भी प्रसिद्ध है।
2.स्मारक की स्थापना और निर्माण
1962 में, कन्याकुमारी के RSS कार्यकर्ताओं के मन में यहाँ भव्य स्मारक बनवाने का विचार आया था। ‘हैंदव सेवा संघ’ के अध्यक्ष वैलयुधन पिल्लई ने इसकी पहल शुरू की। उसी दौरान, पश्चिम बंगाल स्थित ‘रामकृष्ण मिशन’ के नेतृत्व में चेन्नई (तब मद्रास) में एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें मिशन के अध्यक्ष स्वामी सत्त्वानंद भी मौजूद थे और उनके मन में भी स्मारक निर्माण के विचार आए।
3.एकनाथ रानडे और स्मारक का निर्माण
RSS के सरकार्यवाह रहे एकनाथ रानडे ने इस स्मारक के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय, कन्याकुमारी में ईसाई मछुआरों की संख्या बहुत अधिक थी, जिनका धर्मांतरण पुर्तगाल से आए सेंट जेवियर ने कराया था। ईसाइयों ने इस शिला पर अपना दावा ठोकते हुए क्रॉस कर दिया था, जिसका हिन्दुओं ने विरोध किया और अंततः इसे हटा दिया गया।
मोदी की साधना और 2024 के लोकसभा चुनाव :
1.साधना का महत्व और प्रक्रिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवा वस्त्र धारण कर, उदय होते सूर्य को जल अर्पित किया और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के सामने ध्यान लगाया। इस साधना में उन्होंने ओंकार के नाद के बीच माला से जाप भी किया।
2.चुनावी संदर्भ
2024 के लोकसभा चुनाव के 7वें चरण का मतदान शनिवार (1 जून, 2024) को होना है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी की साधना उनके आध्यात्मिक पक्ष को उजागर करती है और स्मारक के महत्व को फिर से रेखांकित करती है।
स्मारक की स्थापना के संघर्ष :
1.हिन्दू-ईसाई संघर्ष
कन्याकुमारी में ईसाइयों ने सेंट जेवियर की शिला बताकर यहाँ क्रॉस कर दिया था। हिन्दुओं ने इसके विरोध में सभाएँ आयोजित कीं और क्रॉस को हटाने में सफल रहे। 17 जनवरी, 1963 को यहाँ शिलालेख स्थापित किया गया था, जिसे ईसाइयों ने समुद्र में फेंक दिया था। फिर भी, इस स्मारक का निर्माण पूरा हुआ।
2.नौका सेवा और स्थानीय विरोध
जब पहली बार नौका सेवा प्रारंभ की गई, तो स्थानीय नाविकों ने इसका बहिष्कार किया। इस समस्या का समाधान केरल से नाविकों को बुलाकर किया गया।
हमारा निष्कर्ष :
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विवेकानंद शिला स्मारक पर साधना, इस स्थल के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को उजागर करती है। यह साधना न केवल उनके आध्यात्मिक पक्ष को दिखाती है, बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है।

