बिहार में मुस्लिम घुसपैठियों की एक बड़ी आबादी है। जो म्यांमार और बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल के रास्ते अवैध रूप से रह कर आबादी में घुल मिल गए हैं। माना जाता है कि इनकी संख्या 66 लाख से 1 करोड़ के बीच है। इनमें से लगभग 66 लाख अवैध घुसपैठिए बिहार के लोगों के हक के रोजगार पर कब्जा जमाए हुए बैठे हैं।
राजनीति में कोई भी कदम बिना फायदे के नहीं उठाए जाते हैं। सत्ता के गलियारों की दुनिया का शाश्वत सत्य है। हालांकि अपवाद हर समय और हर जगह रहा है, इसलिए इसमे भी हो सकता है। बिहार की राजनीति के चिर प्रतिद्वंदी लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की लंबे समय से की जा रही मांग पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा जातीय जनगणना या जातीय सर्वे कराने का निर्णय लोकोपकारी कम राजनीतिक हित वाला ज्यादा साबित होता है। हालांकि इस गणना का इस्तेमाल राजनीति से हटकर किया जाए तो लंबे समय में इसके फायदे भी नजर आएंगे। जातीय गणना में भाजपा की मांग पर मुस्लिमों सहित सभी धर्मों की जातीय और उप_जातीय गणना को शामिल किया गया है। हालांकि इस जातीय गणना से उन मुल्ले-मौलवीयों का यह भ्रम भी दूर होगा कि मुस्लिमों में जाति आधारित व्यवस्था नहीं है। लेकिन,इस लेख का विषय दूसरा है इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि जातीय गणना के दौरान बिहार की नीतीश सरकार अवैध बांग्लादेशी और घुसपैठियों रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर क्या रुख अपनाएंगे।
भाजपा ने रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशियों को लेकर रखी मांग
सर्वदलीय बैठक में भाजपा ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसमें अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम और घुसपैठ रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर बाहर रखना होगा। इसका लाभ उन्हें किसी भी तरह नहीं मिलना चाहिए इसके अलावा उच्च जाति वाले मुस्लिम खुद को निम्न जाति का बताकर इसका लाभ ना ले सके यह भी सरकार को सुनिश्चित करना होगा ।
जातीय गणना का कोई मैकेनिज्म नहीं NRC लागू करने से सीएम ने किया था मना
बता दें कि जब इन अवैध घुसपैठियों की पहचान के लिए केंद्र की भाजपा सरकार ने राष्ट्रीय पंजीयन रजिस्टर (NRC) को देशभर में लागू करने के बात कही थी,तब वोट बैंक को देखते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे लागू करने से साफ मना कर दिया। नीतीश कुमार ने कहा था दरभंगा में हायाघाट ब्लॉक के चंदनपट्टी में मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में एक समारोह को संबोधित कहा था कि बिहार में NRC लागू नहीं किया जाएगा।
