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    महाभारत की कथा ।

    मै उम्मीद करता हूँ की आपने  महाभारत के पिछले भागो को पढ़ा होगा और काफी कुछ सीखा होगा। महाभारत के इस भाग में आज हम बात करने जा रहे है, गांधार के राजा सुबला के पुत्र, रानी गांधारी के छोटे भ्राता और 102 कौरवो के मामा शकुनि के बारे में।वैसे तो आपसब को पता होगा की महाभारत के युद्ध का एक बहुत बरा कारण शकुनि की कूटनीति भी थी, जो की हमेशा कौरवो को पांडवो के विरुद्ध उक्साती रहती थी।शकुनि काफी विद्वान व्यक्ति थे जो की गहरी सोच रखते थे और उनकी दूर दृस्टिकोण काफी तीव्र थी। आप सब ने देखा होगा की शकुनि कौरवो का काफी साथ देते थे चाहे वो युद्ध का मैदान हो या राज्य की राजनीती लेकिन आप सब को जानकार ये हैरानी होगी की शकुनि करोवो के हितैषी नहीं बल्कि शत्रु मानते थे और इसलिए उन्होंने महाभारत का युद्ध करवाया जिससे कौरवो का विनाश हो सके।दरअसल शकुनि हमेशा से ही धृतराष्ट्र तथा उनके के वंश का अंत चाहते थे और इसलिए उन्होंने एक रणनीति के तहत कौरवो और पांडवो को लड़वाया जिसमे शकुनि को ये बात पता थी की इस युद्ध में पांडवो की विजय और कौरवो का अंत निश्चित है।

    जैसा की हमने आपको बताया की शकुनि गांधार देश के राजा शुबला के पुत्र  रानी गांधारी के छोटे भ्राता और 102 कौरवो के मामा थे।शकुनि की धृतराष्ट्र से और कौरवो से दुश्मनी की दो बरी वजहें थी पहली उनकी बहन गांधारी की शादी एक अंधे व्यक्ति से होना तथा दूसरी उनके पिता का अपमान।

    पहली वजह का विस्तार, रानी गांधारी का विवाह एक अंधे व्यक्ति से होना : 
    आप सबको ज्ञात हो की हस्तिनापुर के राजा ने गांधार देश के राजा सुबला को हराया था और इस वजह से अपने राज्य को बचाने के लिए सुबला पुत्री गांधारी ने एक हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से शादी की जो की अंधे थे।अपने पति के अंधे होने की वजह से रानी गांधारी ने भी पतिव्रता धर्म निभाते हुए जीवन भर अपनी आँखों पर सफ़ेद पट्टी बांधने का निर्णय लिया  और प्रतिज्ञा लिया की वो कभी भी खुली आँखों से कुछ भी नहीं देखेंगी। शकुनि अपनी प्यारी बहन के इन तकलीफो को देखकर काफी क्रोधित हुए और मन ही मन उनके अंदर कौरवो के लिए शत्रुता की बीज पनपने लगी लेकिन फिर भी शकुनि कुछ नहीं कर पाए क्युकी उनका राज्य हस्तिनापुर से परास्त हो चूका था।

    दूसरी वजह का विस्तार, शकुनि के पिता का अपमान :
    एक बार की बात है गांधार नरेश ने अपनी पुत्री गांधारी की कुंडली एक साधु को दिखाई जिसके बाद साधु ने बताया की आपके पुत्री के कुंडली में एक दोष् है की आपकी पुत्री की शादी जिस भी पहले इंसान से होगी उसकी मृत्यु हो जाएगी।इस बात से चिंतित गांधार नरेश शुबला ने अपनी पुत्री गांधारी का विवाह के एक बकरे से करवा दिया और उसके बाद उस बकरे को मार दिया।इस तरह से गांधारी शाप मुक्त तो हो चुकी थी लेकिन वो एक बकरे की विधवा भी होगयी थी, इस बात का पता सिर्फ गांधार नरेश शुबला तथा उनके विश्वश्नीये करीबियों को ही था। कुछ वर्ष बाद गांधार नरेश शुबला पुत्री गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ लेकिन एक बकरे की विधवा वाली बात धृतराष्ट्र और पांडवो को नहीं बताई गयी।

    अब धृतराष्ट्र और गांधारी का विवाह हो चूका था लेकिन कुछ समय पश्चात्त ये सच्चाई सबके सामने आ गई की गांधारी एक बकरे की विधवा है। इस बात से धृतराष्ट्र और पाण्डु को काफी ठेश पहुंची और पुनः हस्तिनापुर ने गांधार देश पर आक्रमण कर गांधार नरेश शुबला तथा उनके सौ पुत्रो को बंदी बना कर कारागार में बंद कर दिया। कारागार के अंदर गांधार नरेश तथा उनके 100 पुत्रो के साथ काफी बुरा व्यहवार किया जाता था, उनको मारा-पीटा जाता था, धृतराष्ट्र अपने रिश्ते का भी मान नहीं रखते थे तथा गांधार नरेश शुबला और उनके 100 पुत्रो को मात्र 1 मुठी चावल दी जाती थी जिसको वो मिल बाँट कर खा लेते थे। दिन बीतते गए और एक के बाद एक राजा शुबला के पुत्रो की मौत भूख के कारन होती गयीतब राजा शुबला ने सोचा की अगर ऐसा ही चलता रहा तो उनके वंश का अंत हो जायेगा सो राजा शुबला ने निर्णय लिया की जो भी भोजन उनको तथा उनके पुत्रो को मिलता है वो किसी एक पुत्र को पूरा भोजा खिला दिया करेंगे जिससे उनमे से कोई एक जीवित रहे और ताकतवर बने और उन सभी के अपमान और कष्ट का बदला ले सके। शकुनि सभी भाइयो में छोटे थे तथा बुद्धिमान थे इसलिए गांधार नरेश ने निर्णय लिया की सभी अपना त्यागा हुआ भोजन शकुनि को देंगे लेकिन शकुनि अपने पिता के इस निर्णय के विरुद्ध थे क्युकी उनसे अपने पिता और भाइयो की तरप नहीं देखि जा रही थी।अंततः शकुनि को गांधार नरेश शुबला ने बहुत समझाया जिसके बाद शकुनि ने अपने पिता के आज्ञा को मान लिया और कौरवो को अपना सबसे बरा शत्रु मान लिया।

    शकुनि कैसे कारन बने कौरवो के अन्त का :
    समय बीतता गया और गांधार नरेश शुबला काफी कमजोर होते गए, इसी दौरान राजा शुबला ने धृतराष्ट्र से माफ़ी मंगाते हुए आग्रह किया की उनके छोटे पुत्र शकुनि को माफ़ कर दिया जाये और कारागार की सजा से मुक्त कर दिया जाये साथ ही साथ राजा शुबला ने धृतराष्ट्र से ये भी कहा की अगर आप ऐसा करते है तो शकुनि आपका तथा कौरवो का सदैव हितैषी बन कर आपकी मदद करेगा।धृतराष्ट्र ने अपने ससुर की इस आखिरी इच्छा को मानते हुए शकुनि को अपने साथ हस्तिनापुर ले आये। कुछ दिनों पश्चात राजा शुबला की मृत्यु हो गयी और शकुनि धृतराष्ट्र तथा कौरवो का सबसे बरा शत्रु बन गया, मगर गांधार नरेश शुबला ने मरने से पूर्व अपने छोटे पुत्र शकुनि के एक पैड़ निशानी के रूप में मूर्छित करते हुए कहा की मेरे मरने के बाद मेरे रीढ़ की हड्डी से ऐसे पासे बनाना जो की तुम्हारे मन अनुसार अंक दिखाए और इन्ही पासो की मदद से तुम कौरवो का विनाश करना ( इन्ही पासो को शकुनि ने पांडवो और कौरवो के बिच हुए खेल में इस्तेमाल किया था जिसमे पांडव सब कुछ सहित अपनी पत्नी द्रौपदी को भी हार गए थे जिसके बाद कौरवो के द्वारा द्रौपदी का चिर हरण होता है और इसी कारण से महाभारत का युद्ध भी होता है जिसमे कौरवो का पूरी तरह से विनाश हो जाता है )

    शकुनि अपने पिता के वचन के अनुसार कौरवो के सबसे बरे शुभचिंतक और हितैषी तो बने रहे लेकिन दूसरी तरफ वो कौरवो को गलत ज्ञान देते रहे और उनके मन हमेशा गलत बात डालते रहे। शकुनि जानते थे की कौरव पांडवो को पसंद नहीं करते और इसी बात का शकुनि ने फायदा उठाया और कौरवो और पांडवो को आपस में लड़वा दिया। शकुनि ये बात जानते थे की जिनके तरफ से भगवान श्रीकृष्ण लड़ रहे है उनको हरा पाना नामुमकिन हैलेकिन फिर भी शकुनि ने कौरवो को कभी नहीं रोका। इस प्रकार से शकुनि कौरवो के सबसे बरे हितैषी होने के साथ साथ सबसे बरे शत्रु भी थे। शकुनि की मृत्यु सहदेव के हाथो से हुई थी।