अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से सांसद राइली एम. मूर ने 4 अगस्त 2026 को X (पूर्व ट्विटर) पर एक पोस्ट लिखकर भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला बोल दिया। उन्होंने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को “ईसाइयों पर स्पष्ट हमला” करार दिया और धमकी दी कि अगर यह विधेयक आगे बढ़ा तो भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुँचेगा। मूर ने संत थॉमस का नाम लेकर भावुकता का नाटक भी किया कि ईसाई धर्म भारत में सदियों से है, फिर भी भारत सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा करने जा रही है।
यह बयान सिर्फ एक अमेरिकी सांसद की व्यक्तिगत राय नहीं है। यह विदेशी मिशनरी नेटवर्क, धर्मांतरण उद्योग और भारत की आंतरिक मामलों में दखल देने की पुरानी आदत का ताजा उदाहरण है। भारत को यह समझना होगा कि राइली मूर जैसे नेता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, धार्मिक जनसांख्यिकी और संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं। FCRA संशोधन विधेयक कोई “ईसाइयों पर हमला” नहीं है। यह विदेशी धन के दुरुपयोग, अवैध हस्तांतरण और धर्मांतरण के कारोबार पर लगाम लगाने वाला जरूरी कदम है।
राइली मूर का झूठा नैरेटिव: चर्चों पर कब्जे का डर फैलाना :
मूर का मुख्य आरोप यह है कि विधेयक सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करने की अनुमति देता है। यह आरोप पूरी तरह भ्रामक और जानबूझकर फैलाया गया झूठ है। मार्च 2026 में लोकसभा में पेश किए गए FCRA संशोधन विधेयक का उद्देश्य उन संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उससे बनी परिसंपत्तियों का प्रबंधन करना है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, जिन्होंने लाइसेंस सरेंडर कर दिया है या नवीनीकरण नहीं करवाया।
विधेयक में स्पष्ट प्रावधान है कि अगर कोई परिसंपत्ति पूजा स्थल है, तो उसकी धार्मिक पहचान बनाए रखी जाएगी। सरकार न तो किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च का धार्मिक स्वरूप बदल सकती है और न ही मनमाने तरीके से कब्जा कर सकती है। केवल विदेशी धन से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण की बात है, ताकि धन का दुरुपयोग न हो। आदेशों के खिलाफ अपील और समीक्षा का अधिकार भी दिया गया है।
फिर मूर और उनके जैसे लोग सिर्फ ईसाइयों का नाम क्यों लेते हैं? क्योंकि कानून धर्म-निरपेक्ष है। यह हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध या किसी भी धर्म की संस्थाओं पर समान रूप से लागू होता है। मूर जानबूझकर “ईसाइयों पर हमला” का नैरेटिव गढ़ रहे हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। इससे पहले अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने भी मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी के FCRA लाइसेंस निलंबन का मुद्दा उठाया था और वही धमकियाँ दी थीं। ये दोनों सांसद एक ही लॉबी के प्रतिनिधि लगते हैं।
FCRA कोई धार्मिक कानून नहीं, विदेशी फंडिंग का नियंत्रण है :
FCRA 2010 और उसका प्रस्तावित संशोधन विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करने वाला कानून है। भारत जैसे देश में जहाँ विदेशी धन से अस्थिरता, विरोध प्रदर्शन और धर्मांतरण की गतिविधियाँ चलती रही हैं, ऐसा कानून जरूरी है। अमेरिका खुद विदेशी एजेंट्स पंजीकरण अधिनियम (FARA) रखता है। ब्रिटेन में विदेशी प्रभाव पंजीकरण स्कीम है। ऑस्ट्रेलिया में FITAA है। ये सभी देश विदेशी धन और प्रभाव को नियंत्रित करते हैं। फिर भारत पर “लोकतंत्र विरोधी” होने का आरोप क्यों?
भारत की खासियत यह है कि FCRA पूर्व अनुमति आधारित व्यवस्था है, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। 2019 से 2022 के बीच 13,520 संस्थाओं ने 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान लिया। जुलाई 2026 तक 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र थे, जबकि 22,498 रद्द और 15,212 समाप्त हो चुके थे। इतना बड़ा धन प्रवाह बिना सख्त नियंत्रण के देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।
गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को नियमों में संशोधन कर कुछ धार्मिक गतिविधियों को Proselytisation के दायरे से बाहर रखा। फिर भी मूर जैसे लोग चीख रहे हैं। असली समस्या यह है कि विदेशी फंडिंग का बड़ा हिस्सा धर्मांतरण, चर्च प्लांटिंग और कमजोर वर्गों को निशाना बनाने में लगता है।
विदेशी मिशनरी नेटवर्क और धर्मांतरण का कारोबार :
राइली मूर की चिंता का असली कारण यह है कि FCRA संशोधन से विदेशी मिशनरी संगठनों की आसान फंडिंग बंद हो सकती है। दशकों से अमेरिका और यूरोप आधारित संगठन भारत में गरीब आदिवासियों, दलितों और महिलाओं को निशाना बनाकर धर्मांतरण करवा रहे हैं। Compassion International, World Vision India, Joshua Project जैसे संगठन सक्रिय रहे हैं।
World Vision International का उदाहरण लें। यह संगठन खुद को मानवीय संगठन बताता है, लेकिन असल में ईसाई कट्टरपंथी एजेंडा चलाता है। इसे USAID से फंडिंग मिलती रही, जिसने कई बार भारत विरोधी और हिंदू विरोधी गतिविधियों को पैसा दिया। पूर्वोत्तर भारत में इसकी गतिविधियाँ खास तौर पर संदिग्ध रहीं। 2024 में मोदी सरकार ने इसका FCRA लाइसेंस रद्द किया। इससे पहले इंदिरा गांधी सरकार के समय भी इसे खुली छूट मिली थी। 1972 में नागालैंड में बिली ग्राहम को आने की अनुमति दी गई थी, जबकि तब विदेशी प्रवेश प्रतिबंधित था।
Joshua Project खुलेआम जनजातियों और जातियों को “अनारक्षित” बताकर धर्मांतरण का लक्ष्य निर्धारित करता है। World Council of Churches और World Evangelical Alliance जैसे संगठन भारत के एंटी-कन्वर्जन कानूनों का विरोध करते रहे हैं। ये संगठन भारत की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलना चाहते हैं। जब सरकार इनकी फंडिंग पर लगाम लगाती है, तो अमेरिका के सांसद “ईसाइयों पर हमला” चिल्लाने लगते हैं।
मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर भी कई सवाल उठे हैं। उनके संस्थानों में धर्मांतरण की शिकायतें आईं। FCRA लाइसेंस निलंबन के बाद विदेशी सांसद तुरंत सक्रिय हो गए। यह संयोग नहीं है।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना और विदेशी फंडेड एनजीओ की साजिश :
विदेशी फंडिंग सिर्फ धर्मांतरण तक सीमित नहीं। यह विकास विरोधी आंदोलनों को भी पैसा पहुँचाती है। कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना का उदाहरण याद करें। तमिलनाडु की इस महत्वपूर्ण परियोजना को वर्षों तक विदेशी फंडेड एनजीओ और वामपंथी दलों ने रोके रखा। पर्यावरण और स्थानीय लोगों के नाम पर आंदोलन चलाया गया, लेकिन असल में विदेशी हित और ऊर्जा सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने की कोशिश थी। कई एनजीओ का FCRA रद्द होने के बाद ऐसे आंदोलन कमजोर पड़े।
सरकार की सूची में FCRA रद्दीकरण के कारणों में एंटी-डेवलपमेंट गतिविधियाँ, विरोध प्रदर्शन भड़काना और जबरन धर्मांतरण शामिल हैं। ये तथ्य मूर जैसे नेताओं को नहीं सुहाते, क्योंकि इनसे उनके मिशनरी नेटवर्क का कारोबार प्रभावित होता है।
भूराजनीतिक महत्वाकांक्षा और भारत-अमेरिका संबंधों की हकीकत :
मूर भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुँचने की धमकी देते हैं। यह धमकी खोखली है। भारत और अमेरिका के संबंध व्यापार, रक्षा, इंडो-पैसिफिक रणनीति और चीन के मुकाबले सहयोग पर आधारित हैं। एक सांसद के बयान से ये संबंध नहीं टूटने वाले। बल्कि भारत अगर अपनी संप्रभुता की रक्षा नहीं करेगा, तो अमेरिका जैसे देशों का सम्मान भी नहीं मिलेगा।
अमेरिका खुद अपने देश में विदेशी प्रभाव को सख्ती से नियंत्रित करता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव, रूसी फंडिंग या किसी भी विदेशी एजेंट पर FARA के तहत कार्रवाई होती है। फिर भारत पर दोहरा मापदंड क्यों? जवाब साफ है—धार्मिक महत्वाकांक्षा और भूराजनीतिक दबाव। कुछ अमेरिकी इवेंजेलिकल समूह भारत को अपना अगला बड़ा धर्मांतरण बाजार मानते हैं। जब भारत इस बाजार को बंद करने की कोशिश करता है, तो राजनीतिक दबाव बनता है।
भारत में ईसाई समुदाय की आबादी स्वतंत्रता के बाद बढ़ी है। संत थॉमस की कहानी ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद है। कई इतिहासकार इसे बाद की रचना मानते हैं। लेकिन मुद्दा इतिहास का नहीं, वर्तमान का है। विदेशी धन से जनसांख्यिकी बदलना और सामाजिक अस्थिरता पैदा करना किसी भी संप्रभु देश के लिए स्वीकार्य नहीं।
भारतीय वामपंथी और मीडिया की भूमिका :
सिर्फ विदेशी नेता नहीं, भारत के कुछ मीडिया घराने और वामपंथी भी इस विधेयक को “अल्पसंख्यकों पर हमला” बता रहे हैं। वे जानबूझकर कानून की धर्म-निरपेक्षता छिपाते हैं। वे नहीं बताते कि हिंदू संगठनों पर भी FCRA की कार्रवाई हुई है। वे नहीं बताते कि विदेशी फंडिंग से कितने एनजीओ ने किसान आंदोलन, सीएए विरोध या अन्य आंदोलनों को हवा दी।
यह नैरेटिव पीड़ित होने का है। असली पीड़ित वे गरीब परिवार हैं जिनके बच्चों को प्रलोभन देकर धर्मांतरित किया जाता है। असली पीड़ित वे आदिवासी समुदाय हैं जिनकी संस्कृति विदेशी मिशनरियों के दबाव में बदल रही है।
भारत को क्या करना चाहिए?
FCRA संशोधन विधेयक को बिना किसी दबाव के पारित किया जाना चाहिए। सरकार को और सख्त कदम उठाने चाहिए। जिन संस्थाओं का लाइसेंस रद्द हुआ है, उनकी संपत्तियों का पारदर्शी प्रबंधन होना चाहिए। धर्मांतरण के मामलों में एंटी-कन्वर्जन कानूनों को और प्रभावी बनाना चाहिए। पूर्वोत्तर और आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरी गतिविधियों की निगरानी बढ़ाई जानी चाहिए।
भारत को अमेरिका या किसी भी देश के सांसद की धमकी से नहीं डरना चाहिए। संप्रभुता पर समझौता नहीं हो सकता। विदेशी धन से चलने वाला धर्मांतरण कारोबार बंद होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सामंजस्य और विकास की राह में बाधा डालने वाले तत्वों पर लगाम जरूरी है।
राइली मूर जैसे नेता भारत को सबक सिखाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन भारत अब 1947 का कमजोर देश नहीं। मोदी सरकार ने FCRA को सख्त किया, कई एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए और विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता बढ़ाई। यह सही दिशा है। अब इस दिशा को और मजबूत करना होगा।
अमेरिकी सांसद अपनी धमकियाँ जारी रख सकते हैं। भारत अपनी जमीन, अपनी संस्कृति और अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा। FCRA संशोधन विधेयक कोई हमला नहीं, आत्म रक्षा है। जो इसे ईसाइयों पर हमला बता रहे हैं, वे असल में विदेशी हितों की रक्षा कर रहे हैं। भारत को इस साजिश को समझना होगा और मजबूती से जवाब देना होगा।

