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विश्लेष, रवीश कुमार वह बेशर्म पत्रकार जो CJP के फर्जी छात्र आंदोलन में पत्रकारों पर हुए हमले को सही ठहरा रहा है :

दिल्ली की सड़कों पर जब कॉकरोच जनता पार्टी के नाम पर जमा उपद्रवी भीड़ पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीट रही थी, उनके कपड़े फाड़ रही थी, माइक तोड़ रही थी और महिला रिपोर्टरों के साथ अभद्रता कर रही थी, तब रवीश कुमार कहाँ थे? स्टूडियो में बैठे हुए, अपने पुराने और खोखले राग को दोहरा रहे थे—‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’। यह कोई सामान्य चुप्पी नहीं थी। यह जानबूझकर चुना गया मौन था। यह उस अहंकार और नफरत का प्रमाण था जिसमें साथी पत्रकारों का खून और अपमान कोई मायने नहीं रखता, बस मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने का एजेंडा ही सबसे बड़ा सत्य बन जाता है।


कॉकरोच जनता पार्टी का यह प्रदर्शन शुरू से ही शांतिपूर्ण होने का दावा करता रहा। लेकिन हकीकत बिल्कुल उलटी निकली। जंतर-मंतर से संसद तक के रास्ते पर उपद्रवियों ने पुलिस पर पथराव किया, वाहनों को नुकसान पहुँचाया और रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को निशाना बनाया। टाइम्स नाउ से लेकर अन्य चैनलों तक के रिपोर्टर घिरे गए, धकेले गए, पीटे गए। कुछ युवा पत्रकारों के कपड़े फाड़े गए। महिला पत्रकारों के साथ जो व्यवहार हुआ, उसे देखकर किसी भी सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। रवीश कुमार के पूर्व साथी तक को निशाना बनाया गया। लेकिन इन सब घटनाओं पर रवीश कुमार का मुँह बंद रहा। पुलिस पर हमले पर चुप्पी। पत्रकारों के लहूलुहान होने पर चुप्पी। प्रधानमंत्री को दी गई गंदी गालियों पर चुप्पी। देश की अखंडता को चुनौती देने वाली भाषा पर चुप्पी।

और फिर आया उनका बयान। 22 जुलाई को अपने एक्स हैंडल पर उन्होंने लिखा कि मूल बात यह है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। उन्होंने कहा कि पंचायतों में, एयरपोर्ट पर, कारों के पीछे पोस्टर लगने चाहिए कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। उन्होंने हिंसा और हुड़दंग न करने की औपचारिक बात जरूर कही, लेकिन उससे पहले और बाद में उन्होंने उसी भीड़ को नैतिक वैधता दे दी जो सड़क पर पत्रकारों को पीट रही थी। यह बैलेंसिंग एक्ट नहीं था। यह उकसावे का खुला फरमान था। जब जमीन पर पत्रकार लहूलुहान हो रहे थे, तब रवीश कुमार लोगों को बता रहे थे कि इस मीडिया पर गर्व नहीं किया जा सकता, इसके न्यूजरूम के लोग शर्म से सहमे रहते हैं, और जनता को हर दिन जागना होगा।

यह भाषा खतरनाक है। यह भाषा उस भीड़ को और उग्र बनाती है जो पहले से ही ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाते हुए पत्रकारों पर टूट पड़ रही है। रवीश कुमार वर्षों से यही नारा दोहराते आ रहे हैं। वे खुद को लोकतंत्र का आखिरी पहरेदार बताते हैं। वे खुद को निष्पक्ष और दूध का धुला साबित करने के लिए बाकी मीडिया को गोदी कहते हैं। लेकिन जब उनके अपने पेशे के लोग सड़क पर पीटे जा रहे होते हैं, तो उनका जमीर सो जाता है। उन्हें सिर्फ वही दर्द महसूस होता है जो उनके राजनीतिक एजेंडे से मेल खाता हो। प्रधानमंत्री को गालियाँ अभिव्यक्ति की आजादी बन जाती हैं, लेकिन पत्रकारों पर जानलेवा हमले ‘जनता का गुस्सा’ बन जाते हैं।

यह दोहरा चरित्र नया नहीं है। रवीश कुमार लंबे समय से एक खास नैरेटिव चलाते रहे हैं जिसमें सरकार की हर आलोचना जायज है, लेकिन सरकार समर्थक या तटस्थ मीडिया पर हमला भी जायज ठहराया जा सकता है। वे भूल जाते हैं कि पत्रकारिता में असहमति हो सकती है, लेकिन हिंसा कभी नहीं। वे भूल जाते हैं कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर पत्रकार सुरक्षित होकर रिपोर्टिंग कर सके, चाहे वह किसी भी विचारधारा का हो। लेकिन उनके लिए लोकतंत्र का मतलब सिर्फ अपनी नफरत को फैलाना रह गया है। मोदी सरकार के प्रति उनकी अंधी नफरत इतनी गहरी हो गई है कि उन्हें देश का हित-अहित दिखना बंद हो गया है।

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ छात्रों का गुस्सा नहीं था। उसमें राजनीतिक तत्व घुस आए थे। परीक्षा लीक और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे हिंसा, अराजकता और पत्रकारों पर हमलों में बदल गया। पुलिस पर पथराव हुआ, कई पुलिसकर्मी घायल हुए। फिर भी कुछ लोग इसे शांतिपूर्ण आंदोलन बताते रहे। और रवीश कुमार जैसे लोग इस हिंसा को अप्रत्यक्ष रूप से जायज ठहराने का काम करते रहे। उन्होंने कभी साफ शब्दों में नहीं कहा कि पत्रकारों को पीटना लोकतंत्र की हत्या है। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि भीड़ को उकसाने वाले नारे खतरनाक हैं। इसके बजाय उन्होंने उसी भीड़ को और ईंधन दिया।

यह प्रोपेगेंडा खतरनाक है क्योंकि यह सामान्य नागरिकों के मन में जहर घोलता है। जब कोई प्रभावशाली आवाज बार-बार कहती है कि एक खास मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है, तो कुछ लोग उसे शारीरिक रूप से मारने या डराने का अधिकार समझने लगते हैं। रवीश कुमार ठीक यही कर रहे हैं। वे लिंचिंग का माहौल बना रहे हैं। वे पत्रकारों को निशाना बनाने वाली मानसिकता को वैधता दे रहे हैं। और फिर खुद को पीड़ित या सत्य का रखवाला बताते हैं।

सच्ची पत्रकारिता सवाल पूछने में होती है, नफरत फैलाने में नहीं। सच्ची पत्रकारिता हिंसा की निंदा करने में होती है, चाहे वह किसी भी तरफ से हो। लेकिन रवीश कुमार ने साबित कर दिया है कि उनके लिए पत्रकारिता एक राजनीतिक हथियार है। वे स्टूडियो में बैठकर भाषण देते हैं, लेकिन जमीन पर लहूलुहान होते पत्रकारों के दर्द को महसूस करने की क्षमता खो चुके हैं। वे गोदी मीडिया का राग अलापते हैं, लेकिन खुद उसी व्यवस्था के लाभार्थी रहे हैं जिसमें ध्यान और प्रभाव मिलता है।

देश को ऐसे पत्रकारों की जरूरत नहीं है जो हिंसा को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दें। देश को ऐसे लोगों की जरूरत है जो साफ कहें कि पत्रकारों पर हमला लोकतंत्र पर हमला है। रवीश कुमार ने इस परीक्षा में पूरी तरह फेल हो गए हैं। उनकी चुप्पी और उनके बयान दोनों ही साबित करते हैं कि वे पत्रकारों की सुरक्षा से ज्यादा अपनी राजनीतिक खुन्नस को महत्व देते हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की विफलता नहीं है। यह उस सोच की विफलता है जो असहमति को हिंसा में बदलने की अनुमति देती है।

अगर रवीश कुमार सच में लोकतंत्र के पहरेदार होते, तो वे सबसे पहले उन पत्रकारों की निंदा करते जिन्होंने भीड़ को पत्रकारों पर टूटने के लिए उकसाया। वे सबसे पहले उन उपद्रवियों की निंदा करते जिन्होंने महिलाओं के साथ अभद्रता की। वे सबसे पहले पुलिस पर पथराव की निंदा करते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने वही किया जो वे हमेशा करते रहे हैं—नफरत का प्रचार और एजेंडे की सेवा।