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विश्लेषण : इंदिरा गांधी की इमरजेंसी और स्नेहलता रेड्डी की चीखें: तानाशाही की क्रूर कहानी

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इंदिरा गांधी द्वारा थोपा गया आपातकाल (1975-77) एक ऐसा काला अध्याय है जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है। 25 जून 1975 को लोकतंत्र को कुचलकर तानाशाही स्थापित कर दी गई। विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और निर्दोष नागरिकों पर अत्याचारों का सिलसिला शुरू हो गया। ऐसी ही एक दर्दनाक घटना है कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी की, जिन्हें मात्र संदेह के आधार पर इतनी क्रूर यातनाएं दी गईं कि सुनकर किसी का भी खून खौल उठे।

स्नेहलता रेड्डी एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री और नर्तकी थीं। उन्होंने भरतनाट्यम की शिक्षा ली थी और कई पुरस्कार जीते थे। लेकिन आपातकाल में उनका एकमात्र "अपराध" था — समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस से दोस्ती। 2 मई 1976 को उन्हें "डायनामाइट केस" में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप था कि वे संसद भवन और अन्य इमारतों को उड़ाने की साजिश में शामिल थीं। IPC की धाराएं 120 और 120A लगाई गईं, लेकिन बाद में कोई आरोप साबित नहीं हुआ। फिर भी मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत उन्हें 8 महीने तक बेंगलुरु जेल में कैद रखा गया।

जेल में उनके साथ जो अमानवीय व्यवहार हुआ, वह किसी तानाशाही शासन की नजीर बन गया। एक मशहूर अभिनेत्री, जो आरामदेह जीवन जीती थीं, उन्हें एक तंग कोठरी में ठूंस दिया गया जहां मुश्किल से एक व्यक्ति खड़ा हो पाता। कोठरी में पेशाबघर की जगह सिर्फ कोने में एक छेद था और लोहे की जालीदार दरवाजा लगा था। फर्श पर सोना पड़ता था। अस्थमा की गंभीर मरीज होने के बावजूद उन्हें कोई उचित इलाज नहीं दिया गया। परिवार से संपर्क तक नहीं होने दिया गया।

उनकी बगल की कोठरी में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता बंद थे। उन्होंने बाद में बताया कि रात के सन्नाटे में स्नेहलता की चीखें सुनाई देती थीं। मधु दंडवते ने अपनी किताब में लिखा कि वे इन चीखों को कभी नहीं भूल पाए। स्नेहलता ने जेल में डायरी लिखी जिसमें उन्होंने यातनाओं का मार्मिक वर्णन किया — "महिलाओं को नग्न करके अपमानित किया जाता था... मानव शरीर का इतना अपमान क्यों?" 

फिर भी स्नेहलता टूटी नहीं। उन्होंने अन्य कैदियों को हौसला दिया, भूख हड़ताल की और जेल प्रशासन पर दबाव बनाकर महिलाओं पर मारपीट और खाने की गुणवत्ता में सुधार कराया। लेकिन क्रूर यातनाओं ने उनका स्वास्थ्य पूरी तरह बिगाड़ दिया। 15 जनवरी 1977 को पैरोल पर रिहा किया गया और मात्र 5 दिन बाद 20 जनवरी 1977 को हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई।