Default Image

Months format

View all

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

404

Sorry, the page you were looking for in this blog does not exist. Back Home

Ads Area

विश्लेषण : इंदिरा गांधी, आपातकाल और RSS: लोकतंत्र की रक्षा में संघ का बलिदान

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आंतरिक सुरक्षा का बहाना बनाकर देश पर आपातकाल थोप दिया। लोकतंत्र को कुचलते हुए विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, मूल अधिकार छीन लिए गए और संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी जैसे अत्याचार हुए। इस काले कालखंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने सबसे बड़ा विरोध किया। प्रतिबंध के बावजूद हजारों स्वयंसेवक भूमिगत होकर संघर्ष करते रहे। आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित लाखों कार्यकर्ता जेल गए। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार 1 लाख से अधिक RSS कार्यकर्ता हिरासत में थे। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस केटी थॉमस ने भी RSS को आपातकाल समाप्त करने का श्रेय दिया। यह लेख उन शहीदों और संघर्षियों को याद करता है जिन्होंने तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र बचाया। 


भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1975-77 का आपातकाल सबसे काला अध्याय है। इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग कर देश को तानाशाही के अंधेरे में धकेल दिया। बाहरी खतरे का कोई कारण नहीं था, बल्कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से घबराकर उन्होंने यह कदम उठाया। 

आपातकाल लगते ही विपक्षी नेताओं जैसे जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चौधरी चरण सिंह आदि को गिरफ्तार कर लिया गया। जेलों में थर्ड डिग्री टॉर्चर, डंडे, नाखून उखाड़ने जैसे अमानवीय अत्याचार किए गए। प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई, समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठ खाली छपने लगे। 42वें संशोधन के जरिए चुनाव अवधि बढ़ाई गई और न्यायपालिका को भी कमजोर किया गया। संजय गांधी के निर्देश पर जबरन नसबंदी अभियान चला, जिसमें हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए या विकलांग हो गए। तुर्कमान गेट जैसे इलाकों में बस्तियां बुलडोजर से ध्वस्त कर दी गईं।

लेकिन इस तानाशाही के खिलाफ सबसे मजबूत आवाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थी। संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, फिर भी उसके कार्यकर्ता भूमिगत होकर संघर्ष करते रहे। जेल में बंद नेताओं से संपर्क बनाए रखा, जन-जागरण किया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार आपातकाल में कुल हिरासतों में से एक लाख से अधिक RSS से जुड़े थे। 'द इकोनॉमिस्ट' ने RSS को विश्व का एकमात्र गैर-वामपंथी क्रांतिकारी संगठन कहा। आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उस समय युवा स्वयंसेवक के रूप में भूमिगत कार्य करते रहे।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस केटी थॉमस ने हाल ही में RSS शिविर में कहा कि आपातकाल से देश को मुक्त कराने का श्रेय RSS को जाता है। पत्रकार, साहित्यकारों ने भी विरोध किया। फणीश्वरनाथ रेणु और शिवराम कर्नाथ जैसे लेखकों ने अपने सम्मान लौटा दिए। 

आपातकाल ने साबित किया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सच्चे राष्ट्रवादी होते हैं। RSS ने बिना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के जनता की आवाज बनी। आज जब हम इस कालखंड को याद करते हैं तो उन हजारों अज्ञात शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने तानाशाही के खिलाफ डटकर लड़ाई लड़ी। इंदिरा गांधी की तानाशाही विफल हुई और जनता ने 1977 में उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। यह इतिहास हमें सिखाता है कि सत्ता कितनी भी मजबूत हो, जनता की एकजुटता और साहस के आगे टिक नहीं सकती। 

#Emergency1975 #RSS #IndiraGandhiExposed #HinduUnity #ModiSarkar