भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित, पेशेवर और बहादुर सेनाओं में से एक है। यह सेना न सिर्फ सीमाओं की रक्षा करती है, बल्कि देश की सनातन संस्कृति, एकता और अखंडता का भी प्रतीक है। हाल ही में द वायर में अली अहमद नामक रणनीतिक विश्लेषक (पूर्व कर्नल) का एक लेख छपा, जिसका शीर्षक है – “Indian Army’s New-Found Love for Hindi and Hindutva Has Serious Consequences”। इस लेख में दावा किया गया है कि सेना में हिंदी के बढ़ते इस्तेमाल और हिंदुत्व से जुड़े प्रतीकों (मंदिर दर्शन, धार्मिक अनुष्ठान आदि) से सेना का “हिंदूकरण” हो रहा है, जो उसकी धर्मनिरपेक्ष परंपरा को खतरे में डाल रहा है और इसके गंभीर परिणाम होंगे।
यह लेख अकेला नहीं है। द वायर जैसे कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म्स लगातार हिंदी भाषा और हिंदुत्व को निशाना बनाते रहे हैं। वे इसे “राजनीतिक हस्तक्षेप” या “बहुसंख्यकवाद” बताकर चिंता जताते हैं। लेकिन सवाल यह है – क्या यह चिंता वास्तविक है या यह वामपंथी-इस्लामिस्ट गठजोड़ का नया षड्यंत्र है, जो सेना को कमजोर करने, देश को विभाजित करने और सनातन संस्कृति को बदनाम करने के लिए चलाया जा रहा है?
यह लेख इसी सवाल का विस्तृत, तथ्यों पर आधारित और आक्रामक जवाब है। हम देखेंगे कि सेना में हिंदी और सनातन परंपराएं नई नहीं हैं, बल्कि आजादी के बाद से चली आ रही हैं। हम देखेंगे कि अली अहमद जैसे लेखक किस ऐतिहासिक संदर्भ को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। और सबसे महत्वपूर्ण – हम समझेंगे कि ऐसी “चिंताओं” के पीछे असली मकसद क्या है।
अली अहमद कौन हैं और उनका लेख क्या कहता है?
अली अहमद एक रिटायर्ड कर्नल हैं, जिन्होंने महारता लाइट इन्फेंट्री में सेवा की और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी की है। वे द वायर के नियमित योगदानकर्ता हैं और रणनीतिक मुद्दों पर लिखते हैं। उनके लेख का मुख्य तर्क यह है कि हाल के वर्षों में सेना में हिंदी का इस्तेमाल बढ़ा है, आर्मी चीफ मंदिर जाते हैं, यूनिट्स में धार्मिक अनुष्ठान होते हैं – यह सब “नया प्रेम” है जो हिंदुत्व की ओर झुकाव दिखाता है।
वे लेफ्टिनेंट जनरल हरचरणजीत सिंह पनाग के पुराने लेख का हवाला देते हैं, जिसमें सेना की “धर्मनिरपेक्षता” पर जोर दिया गया था। पनाग ने 2019 में विवादास्पद बयान भी दिया था कि अगर मोदी दोबारा चुने गए तो तख्तापलट की जरूरत पड़ सकती है। अहमद का दावा है कि सेना अब “नीचे से” राजनीतिकरण हो रही है, जनता का भरोसा टूटेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होगी।
यह तर्क नया नहीं है। वामपंथी बुद्धिजीवी दशकों से “सेना का हिंदूकरण” का राग अलापते रहे हैं। लेकिन जब सेना गलवान में चीनी से लोहा लेती है, जब आतंकियों का सफाया करती है, जब बाढ़ राहत या कोविड में मदद करती है – तब ये लोग चुप रहते हैं। असली समस्या यह है कि सेना अब “न्यूट्रल” या “सेकुलर” के नाम पर हिंदू-विरोधी बने रहने को तैयार नहीं है। वह भारत की सभ्यतागत जड़ों से जुड़ रही है। यही इन लोगों को बेचैनी दे रहा है।
सेना में हिंदी भाषा का इतिहास: यह कोई नया षड्यंत्र नहीं, संविधान और राष्ट्रीय एकता का हिस्सा है :
1947 में आजादी मिली तो सेना ब्रिटिश काल की विरासत ढो रही थी – अंग्रेजी कमांड, अंग्रेजी दस्तावेज, अंग्रेजी सोच। स्वतंत्र भारत ने फैसला लिया कि सेना को भारतीय बनाना होगा। 1951 में सरकार ने सभी सैन्य शाखाओं में हिंदी के इस्तेमाल का निर्देश दिया। देवनागरी लिपि में प्रशिक्षण, परीक्षाएं और आधिकारिक कामकाज शुरू हुआ। यह कोई BJP या मोदी सरकार का फैसला नहीं था। यह नेहरू युग की सरकारों का फैसला था, जब “हिंदुत्व” शब्द भी इतना प्रचलित नहीं था।
उद्देश्य साफ था – औपनिवेशिक अंग्रेजी के प्रभुत्व को कम करना और देश की विविधता को जोड़ने के लिए एक संपर्क भाषा देना। भारत जैसे बहुभाषी देश में, जहां पंजाब, तमिलनाडु, बंगाल, राजस्थान, बिहार से सैनिक आते हैं, हिंदी एकता का सेतु बनी। आज भी आर्मी, नेवी, एयरफोर्स में हिंदी का व्यापक इस्तेमाल होता है – आदेश, रेडियो संचार, प्रशिक्षण मैनुअल में।
संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी संघ की राजभाषा है। सेना ने इसे पहले ही अपनाया। हाल के वर्षों में डिजिटल युग में और अधिक हिंदी का इस्तेमाल बढ़ा है क्योंकि यह जमीनी स्तर पर समझने में आसान है। क्या यह “हिंदूकरण” है? बिल्कुल नहीं। यह डी-कॉलोनाइजेशन है – विदेशी भाषा के बोझ से मुक्ति।
अली अहमद और द वायर इसे “हिंदुत्व का षड्यंत्र” बता रहे हैं। लेकिन क्या उन्होंने कभी पूछा कि उर्दू को बढ़ावा देने वाले 19वीं सदी के मुस्लिम अभिजात वर्ग (सर सैयद अहमद खान आदि) ने किस तरह हिंदी-उर्दू विवाद को सांप्रदायिक बना दिया और दो-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी? आज वही लोग या उनके वैचारिक वारिस हिंदी को “बहुसंख्यक थोपना” कहते हैं। दोहरा मापदंड साफ है।
हिंदी आज भारत की लगभग 43% आबादी की मातृभाषा या समझने वाली भाषा है। सेना में यह जबरदस्ती नहीं, व्यावहारिकता है। रेजिमेंट्स अपनी क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का भी इस्तेमाल करती हैं। कोई भाषा दबाई नहीं जा रही।
हिंदुत्व नहीं, सनातन संस्कृति और युद्ध-घोष: सेना की जड़ें हजारों साल पुरानी :
सेना में “हिंदुत्व” नया नहीं है। यह सनातन संस्कृति का स्वाभाविक प्रतिबिंब है। कई रेजिमेंट्स के युद्ध-घोष (war cries) हिंदू या सिख परंपरा से जुड़े हैं:
- राजपूताना राइफल्स: “जय राजा रामचंद्र”
- गढ़वाल रेजिमेंट: “जय बद्री विशाल”
- सिख रेजिमेंट: “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”
- कई यूनिट्स में “हर हर महादेव”, “जय माता दी”, “बजरंग बली की जय”
ये घोष दशकों या सदियों पुराने हैं। ये किसी राजनीतिक पार्टी के नहीं, सैनिकों की आस्था और वीरता के प्रतीक हैं। जब सैनिक युद्ध में “जय श्री राम” या “हर हर महादेव” बोलकर आगे बढ़ते हैं, तो यह उनकी सांस्कृतिक पहचान है, न कि “राजनीतिकरण”।
धार्मिक शिक्षक (religious teachers) सेना में सभी धर्मों के होते हैं – हिंदू पंडित, मुस्लिम मौलवी, सिख ग्रंथी, ईसाई पादरी, बौद्ध भिक्षु। 152 से ज्यादा वैकेंसीज का जिक्र हाल के संदर्भों में आया है। यूनिट्स में दुर्गा पूजा, ईद, क्रिसमस, बैसाखी सब मनाई जाती हैं। आर्मी चीफ का मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होना नया नहीं है। यह सांस्कृतिक जुड़ाव है।
BSF तनोट माता मंदिर की रक्षा 1965 से कर रही है। 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तानी गोले मंदिर के पास गिरे लेकिन मंदिर अछूता रहा – स्थानीय आस्था और सेना की सुरक्षा का प्रतीक। क्या इसे भी “हिंदुत्व” कहेंगे?
लेफ्टिनेंट जनरल पनाग ने 2021 में आर्मी बैंड द्वारा आरती बजाने वाले वीडियो का मजाक उड़ाया था। लेकिन बीटिंग द रिट्रीट समारोह में भारतीय वाद्य और संगीत की परंपरा पुरानी है। सेना ने कभी भी किसी धर्म को दबाया नहीं। समस्या तब आती है जब हिंदू परंपरा को “बहुसंख्यकवाद” बताया जाता है, जबकि अन्य धर्मों की परंपराओं को “समावेशी” कहा जाता है।
वामपंथी मीडिया का असली चेहरा, दोहरे मापदंड, नफरत और देशद्रोही नैरेटिव :
द वायर और अली अहमद जैसे लेखक “सेना की धर्मनिरपेक्षता” की दुहाई देते हैं, लेकिन उनकी परिभाषा में धर्मनिरपेक्षता का मतलब हिंदू संस्कृति को दबाना और अल्पसंख्यक पहचान को बढ़ावा देना है। जब सेना जम्मू-कश्मीर में स्थानीय आबादी से जुड़ने के लिए नमाज में शामिल होती है या अन्य कार्यक्रम करती है, तब कोई शोर नहीं मचता। लेकिन आर्मी चीफ मंदिर जाते हैं तो “राजनीतिक संकेत” बन जाता है।
यह वही मीडिया है जो 26/11 मुंबई हमले के बाद कांग्रेस सरकार की नाकामी पर कम बोलता था, लेकिन अब हर सैन्य सुधार (अग्निपथ, CDS, रणनीतिक दिशा-निर्देश) को “तख्तापलट-रोधी” या “राजनीतिकरण” बताता है। वे भूल जाते हैं कि सेना ने 1962, 1965, 1971, कारगिल, गलवान में जो बहादुरी दिखाई, वह सनातन मूल्यों – धर्म, राष्ट्ररक्षा, त्याग – से प्रेरित थी।
हिंदी और हिंदुत्व पर उनकी “चिंता” असल में भारत के सभ्यतागत पुनरुत्थान से उनकी बेचैनी है। वे उस “सेकुलरिज्म” को खो रहे हैं जो दशकों तक हिंदू पहचान को शर्मिंदा करने का औजार बना रहा। अब जब सेना और राष्ट्र गर्व से अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं, तो ये लेख “गंभीर परिणाम” की धमकी देते हैं।
सेना की सच्ची ताकत: सांस्कृतिक जड़ें + पेशेवर एकता = अजेय शक्ति :
सेना की ताकत उसकी विविधता में एकता है। सिख, मुस्लिम, ईसाई, हिंदू, बौद्ध – सब एक झंडे के नीचे लड़ते हैं। लेकिन यह एकता “खाली” या “न्यूट्रल” नहीं है। यह भारत की सभ्यता, उसके इतिहास, उसके देवी-देवताओं और वीर परंपरा से जुड़ी है। जब सैनिक “जय हिंद” या “भारत माता की जय” बोलता है, तो यह सिर्फ नारा नहीं, आस्था है।
दुनिया की कई सेनाएं अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ मजबूत हैं – इजरायल, रूस, तुर्की, जापान। भारत को क्यों “सेकुलर” के नाम पर अपनी जड़ें काटनी हों? सनातन संस्कृति समावेशी है। यह किसी को दबाती नहीं, सबको स्थान देती है। सेना में भी यही होता है।
अली अहमद जैसे लेखक “गंभीर परिणाम” की बात करते हैं। असली गंभीर परिणाम तो तब होंगे जब सेना को अपनी संस्कृति से काट दिया जाए, जब सैनिकों को अपनी आस्था छुपानी पड़े, जब “सेकुलरिज्म” के नाम पर हिंदू-विरोधी नैरेटिव हावी हो जाए। तब सेना कमजोर होगी, राष्ट्र कमजोर होगा।
अली अहमद का लेख और द वायर का प्लेटफॉर्म इस बात का प्रमाण है कि कुछ ताकतें अभी भी भारत को “हिंदू-बहुसंख्यक” कहकर डराना चाहती हैं। वे सेना को “अपोलिटिकल” रखने के नाम पर उसे सनातन मूल्यों से दूर करना चाहते हैं। लेकिन जनता अब समझ चुकी है। भारतीय सेना पर जनता का भरोसा मीडिया से कहीं ज्यादा है।
हिंदी भाषा संविधान की देन है, सेना की एकता का आधार है। सनातन परंपराएं सेना की आत्मा हैं – युद्ध-घोष, मंदिर, आरती, त्योहार। इन्हें “नया प्रेम” या “हिंदूकरण” बताना ऐतिहासिक तथ्यों का अपमान है।यह समय है इन दोहरे मापदंडों को बेनकाब करने का। यह समय है सेना की बहादुरी, बलिदान और सांस्कृतिक गौरव का सम्मान करने का। जो लेखक सेना पर “नफरत” का आरोप लगाते हैं, वे असल में अपनी हिंदू-विरोधी मानसिकता का इजहार कर रहे हैं।

