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मुस्लिम उम्मा की राजनीति: क्या यह केवल ‘सुविधा का भाईचारा’ है?

🔹 प्रस्तावना: मुस्लिम भाईचारे की खोखली तस्वीर

मुस्लिम देशों के बीच 'उम्मा' यानी इस्लामी भाईचारे का जो विचार प्रचारित किया जाता है, वह वास्तविकता की कसौटी पर अक्सर विफल साबित होता है। इस लेख में हम जानने की कोशिश करेंगे कि कैसे इस्लामी देशों के बीच एक-दूसरे के विरुद्ध हिंसा, राजनीति और पाखंड की एक लंबी श्रृंखला रही है। वहीं, जब बात गैर-मुस्लिम देशों की आती है, तो यह "भाईचारा" अचानक आक्रामकता में बदल जाता है।


🔹 1965 और 1971: ईरान-पाकिस्तान का भारत विरोधी गठजोड़

भारत-पाकिस्तान युद्धों में जहां पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया, वहीं कई मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान का समर्थन किया। 1965 और 1971 के युद्धों में ईरान ने पाकिस्तान को हथियार और सैन्य मदद दी। यह वही ईरान था, जो खुद को शांति और भाईचारे का प्रतीक मानता है, लेकिन भारत के खिलाफ उसकी नीति साफ रूप से पक्षपातपूर्ण थी।


🔹 ईरान की भारत-विरोधी नीति: CAA और धारा 370

भारत में जब नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया गया, तो ईरान ने खुले मंचों पर भारत की आलोचना की। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई ने भारत को चेतावनी तक दे डाली। सवाल उठता है कि क्या यह आंतरिक मुद्दों में हस्तक्षेप नहीं था? 


🔹 अमेरिका का ईरान पर हमला और पाकिस्तानी कनेक्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की बैठक के तुरंत बाद अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की। किसी मुस्लिम देश ने इसका खुला विरोध नहीं किया। उम्मा की चुप्पी से यह साफ होता है कि जब अपने स्वार्थों की बात आती है, तो भाईचारा पीछे छूट जाता है।


🔹 ‘ब्लैक सेप्टेंबर’: पाकिस्तान का फिलिस्तीन विरोधी चेहरा

1970 में जॉर्डन ने फिलिस्तीनियों के खिलाफ 'ब्लैक सेप्टेंबर' नाम से सैन्य अभियान चलाया, जिसमें हजारों फिलिस्तीनियों की हत्या की गई। इस नरसंहार में पाकिस्तान के जनरल ज़िया-उल-हक ने बड़ी भूमिका निभाई। क्या कभी ईरान या किसी अन्य मुस्लिम देश ने पाकिस्तान से सवाल किया? जवाब है – नहीं।


🔹 पाकिस्तान और मुस्लिम देशों की दोहरी नीति

ईरान, तुर्की, पाकिस्तान जैसे देश जब गैर-मुस्लिम राष्ट्रों की बात करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खूब शोर मचाते हैं। लेकिन जब मुस्लिम देश ही एक-दूसरे की हत्या करते हैं या उनके हक छीनते हैं, तो ये देश चुप्पी साध लेते हैं। क्या यह इस्लामी भाईचारे की आत्मा के खिलाफ नहीं है?


🔹 2020 दिल्ली दंगे: हिंदुओं पर दोषारोपण

2020 में दिल्ली में हुए दंगों पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई ने ट्वीट कर ‘हिंदुओं’ को दोषी ठहरा दिया। यह बयान न केवल भारत के आंतरिक मामलों में दखल था, बल्कि एक संप्रभु देश के बहुसंख्यक समुदाय को बदनाम करने की कोशिश भी थी। क्या यह ईरान की 'मुस्लिम-केन्द्रित' सोच को उजागर नहीं करता?


🔹 जब इस्लामी देश आपस में लड़ते हैं: उम्मा की खामोशी

सीरिया, यमन, इराक, अफगानिस्तान—कितने ही मुस्लिम देश आज खुद मुस्लिमों के हाथों तबाह हो रहे हैं। लेकिन उम्मा खामोश है। न सऊदी अरब बोलता है, न ईरान, न पाकिस्तान। इन सबका ‘भाईचारा’ तभी सक्रिय होता है, जब किसी गैर-मुस्लिम देश में मुस्लिमों की बात आती है। यह भाईचारा नहीं, सुविधा की राजनीति है।


🔹 क्या कभी पाकिस्तान के उत्पादों का बहिष्कार होगा?

जैसे ही इजरायल की बात आती है, मुस्लिम देश और भारत में मौजूद कुछ लोग "बॉयकॉट इजरायल" के नारे लगाने लगते हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने "बॉयकॉट पाकिस्तान" की मांग की, जिसने अफगानिस्तान, भारत और फिलिस्तीन जैसे देशों में हिंसा फैलाई? नहीं। क्योंकि उम्मा के लिए पाकिस्तानी पाप भी क्षम्य हैं, अगर वह मुस्लिम है।


🔹 निष्कर्ष: उम्मा नहीं, सुविधा का गठजोड़

मुस्लिम उम्मा की अवधारणा आज के समय में एक पाखंड बन चुकी है। यह भाईचारा नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हितों का एक नकली मुखौटा है। ईरान से लेकर पाकिस्तान तक, हर देश अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए उम्मा का सहारा लेता है, लेकिन जब इंसानियत की बात आती है, तो सब खामोश हो जाते हैं। इसलिए अब वक्त है कि इस 'सुविधाजनक भाईचारे' को उसकी असलियत में देखा जाए।


📊 आँकड़े और तथ्यों के साथ:

  • ईरान ने 1965 और 1971 में पाकिस्तान को लड़ाकू विमान और राइफलें दी थीं।
  • CAA और 370 को लेकर OIC (Organization of Islamic Cooperation) ने भारत की आलोचना की, जबकि वही OIC कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक पर चुप रहा।
  • 'ब्लैक सेप्टेंबर' में लगभग 3,500 फिलिस्तीनी मारे गए — पाकिस्तान जनरल ज़िया उल हक की निगरानी में।
  • 2020 दिल्ली दंगों पर अयातुल्ला खामेनेई का ट्वीट— "The hearts of Muslims all over the world are grieving over the massacre of Muslims in India."
  • यमन में अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, अधिकतर हमले सऊदी अरब द्वारा।

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