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बिश्नोई समाज की माँग, चुनाव की तारीख बदली - जाने कारण

सारांशचुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में विधानसभा चुनाव की मतदान और मतगणना की तारीखों में बदलाव किया है। यह बदलाव बिश्नोई समाज और भाजपा की हरियाणा यूनिट की मांग के आधार पर किया गया है। पहले हरियाणा में मतदान 1 अक्टूबर को होने वाला था, लेकिन अब यह तारीख बदल दी गई है। दोनों राज्यों के लिए मतगणना 8 अक्टूबर को होगी। बिश्नोई समाज के त्योहार को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया है।

इस खबर के मुख्य बिंदु :-
1. बिश्नोई समाज की मांग पर तारीख में बदलाव : चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में विधानसभा चुनाव की तारीखों में बदलाव का निर्णय लिया है। बिश्नोई समाज और भाजपा की हरियाणा यूनिट की मांग पर, मतदान की तारीख 1 अक्टूबर से बदल दी गई है। दोनों राज्यों में अब मतदान और मतगणना 8 अक्टूबर को होगी। बिश्नोई समाज का त्योहार आसोज अमावस्या 2 अक्टूबर को पड़ रहा है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया है।

2. बिश्नोई समाज का आसोज अमावस्या त्योहार : बिश्नोई समाज हर साल आसोज अमावस्या के दिन गुरु जम्भेश्वर को याद करते हुए त्योहार मनाता है। यह एक सदियों पुरानी परंपरा है, जो आज भी बिश्नोई समाज द्वारा श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। इस बार त्योहार 2 अक्टूबर को पड़ रहा है। चुनाव की तारीख 1 अक्टूबर होने के कारण सिरसा, फतेहाबाद और हिसार के हजारों बिश्नोई मतदाताओं को मतदान से वंचित होना पड़ सकता था, इसलिए चुनाव आयोग ने उनकी मांग को स्वीकार करते हुए तारीख बदली है।

3. चुनाव की तारीखों में बदलाव की अन्य मिसालें : चुनाव आयोग ने पहले भी विभिन्न धर्मों और समुदायों के त्योहारों को ध्यान में रखते हुए चुनाव की तारीखों में बदलाव किए हैं। 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान गुरु रविदास जयंती के कारण मतदान की तारीख को एक सप्ताह आगे बढ़ाया गया था। इसी तरह, 2022 में मणिपुर विधानसभा चुनाव के दौरान ईसाई समाज के रविवार के प्रेयर के लिए तारीख बदली गई थी। राजस्थान में देवउठनी एकादशी के कारण भी चुनाव की तारीख में बदलाव किया गया था।

4. राजनीतिक विवाद और आलोचना : हालांकि, चुनाव आयोग के इस निर्णय पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस जैसे दलों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे राजनीतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय बताया है। वे आरोप लगा रहे हैं कि यह फैसला भाजपा की मांग पर लिया गया है, ताकि वह अपने मतदाताओं को प्रभावित कर सके। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग ने धार्मिक त्योहारों को ध्यान में रखते हुए चुनाव की तारीखों में बदलाव किया है।