बुद्ध, जिन्हें गौतम बुद्ध के नाम से भी जाना जाता है, ने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया। परन्तु, यह भी सत्य है कि बुद्ध जनमानस को वह आकर्षण नहीं दे पाए जो अन्य सनातन धर्म के देवताओं को प्राप्त हुआ। इस लेख में हम इस विषय पर विचार करेंगे कि क्यों बुद्ध और उनका धर्म बौद्धमत भारत में राजधर्म होने के बावजूद जनमत नहीं बन सका।
बौद्धमत का उदय और पतन :
भारत में एक लंबे समय तक बौद्धमत राजधर्म रहा। इस कालखंड में बौद्धमत ने सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए। तथापि, जैसे ही बौद्ध सत्ता का पतन हुआ, लोग पुनः सनातन धर्म की ओर लौट आए। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है कि क्यों बौद्धमत ने लोक मानस में अपनी गहरी पकड़ नहीं बनाई।
जनमानस और बुद्ध का संघर्ष :
भारत की माताएं सदैव भगवान राम और कृष्ण को अपने आंगन में खेलने की कामना करती रहीं, परन्तु किसी माँ ने कभी यह प्रार्थना नहीं की कि उनके घर बुद्ध जन्में। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि बुद्ध का जीवन संघर्ष और त्याग की कहानी आम जनमानस को उतना आकर्षित नहीं कर पाई जितना कि राम और कृष्ण की कहानियाँ।
बुद्ध के जीवन की कथा :
सिद्धार्थ के बुद्ध बनने की कहानी आम जनश्रुति में यह है कि वे जीवन के दुखों को सह नहीं पाए और त्याग का मार्ग अपना लिया। यह आदर्श ज्ञानियों के लिए प्रेरणादायक हो सकता है, पर आम जनमानस संघर्ष और विजय में विश्वास करता है। भारत ने सदैव उन नायकों को आदर्श माना जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से लड़कर सफलता पाई।
बुद्ध का सामाजिक और धार्मिक प्रभाव :
बुद्ध ने तात्कालिक सामाजिक विकृतियों और सनातन में पसर चुकी अव्यवस्था का विरोध किया। उन्होंने कर्मकांडों की अति पर प्रहार किया, पर उनके अनुयायियों ने उनके जाने के बाद जो अति की, वह भारत के धार्मिक इतिहास का विकृत स्वरूप बन गया। बुद्ध ने गया, सारनाथ और पाटलिपुत्र जैसे स्थानों की यात्रा की परन्तु बनारस नहीं गए। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि बनारस सनातन धर्म का बौद्धिक केंद्र था।
आध्यात्मिकता में बुद्ध और सनातन :
बुद्ध के पास कोई ऐसी नई आध्यात्मिक थाती नहीं थी जो सनातन में न हो। उनके विचार पूर्णतः विशुद्ध भारतीय थे और शांति, न्याय, अहिंसा, समानता जैसे सनातनी भावनाओं का ही प्रतिनिधित्व करते थे। बुद्ध और सनातन के बीच कोई वास्तविक भिन्नता नहीं थी, और वे केवल सामाजिक और धार्मिक सुधारक थे न कि ईश्वर।
बुद्ध का सही स्थान :
दरअसल, बुद्ध को एक संत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए था। उनके अनुयायियों ने उन्हें ईश्वर का दर्जा दे दिया जो उनके जीवन और विचारों के विपरीत था। बुद्ध स्वयं ईश्वरत्व को नकारते रहे और उनके अनुयायियों ने उन्हें ही ईश्वर बना दिया।
निष्कर्ष :
बुद्ध एक महान संत और सुधारक थे जिनका आदर और सम्मान किया जाना चाहिए। उनकी शिक्षाएं और उनके विचार विशुद्ध भारतीय थे और उनका योगदान अविस्मरणीय है। हम सभी को बुद्ध के विचारों से प्रेरणा लेते हुए उन्हें एक संत के रूप में प्रणाम करना चाहिए न की ईश्वर के रूप में।

