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सुप्रीम कोर्ट और तर्कहीन याचिकाएं: न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

हाल के वर्षों में, भारत की न्यायिक प्रणाली में तर्कहीन और निराधार याचिकाओं की बाढ़ सी आ गई है। यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि इसके परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालयों पर भी अनावश्यक दबाव पड़ता है। इस प्रवृत्ति को रोकने की आवश्यकता है, ताकि न्यायालय अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

ADR की याचिका: एक उदाहरण :
पिछले महीने, 27 अप्रैल को, सुप्रीम कोर्ट ने Association for Democratic Reforms (ADR) की EVM और VVPAT के शत प्रतिशत मिलान के लिए दायर याचिका को खारिज कर दिया था। यह याचिका प्रशांत भूषण ने लड़ी थी, जिसका उद्देश्य चुनाव आयोग और वर्तमान सरकार को निशाना बनाना था। इस याचिका के खारिज होने के बाद, ADR ने एक और याचिका मात्र 15 दिन बाद, 10 मई को सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दी, जिसमें चुनाव आयोग से "डाले गए वोटों का प्रमाणित डेटा" जारी करने की मांग की गई।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया :
17 मई को, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया, जिसमें ADR द्वारा मांगी गई जानकारी के बारे में एक हफ्ते के भीतर जानकारी देने का निर्देश दिया गया। चुनाव आयोग ने 24 मई को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके यह स्पष्ट किया कि फॉर्म 17C में वोटों की जानकारी मांगने का कोई अधिकार नहीं है और इससे मतदाताओं में भ्रम फैल सकता है।

चुनाव आयोग की स्थिति :
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में बताया कि फॉर्म 17C में प्रत्येक मतदान केंद्र का रिकॉर्ड होता है, जो मतदान समाप्त होने के बाद प्रत्याशी के एजेंट को दे दिया जाता है। यह डेटा सार्वजनिक करने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे चुनाव प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव खत्म होते ही जब जानकारी प्रत्याशी को दे दी जाती है, तो 48 घंटे में डेटा वेबसाइट पर डालने का कोई औचित्य नहीं है।

तर्कहीन याचिकाओं का उद्देश्य :
ऐसी याचिकाओं का मुख्य उद्देश्य चुनाव आयोग को उलझाए रखना और चुनाव प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करना है। ये संगठन और व्यक्ति, जो इन याचिकाओं को दायर करते हैं, देश में अराजकता फैलाने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इन याचिकाओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि इनका वास्तविक उद्देश्य क्या है।

ADR और प्रशांत भूषण की भूमिका :
ADR को एक गैर राजनीतिक, गैर पक्षपात और गैर लाभकारी संगठन माना जाता है, लेकिन इसकी गतिविधियों और प्रशांत भूषण की उपस्थिति इसे संदेहास्पद बनाती है। ADR के फंड की जांच आवश्यक है ताकि यह पता चल सके कि इसके पीछे कौन सी शक्तियाँ काम कर रही हैं। प्रशांत भूषण जैसे वकीलों की उपस्थिति से यह स्पष्ट होता है कि यह संगठन किसी न किसी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है।

निष्कर्ष :
सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालयों को तर्कहीन याचिकाओं पर लगाम लगानी चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग रोकने के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए। इससे न केवल न्यायालय की गरिमा बनी रहेगी, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी सुचारू रूप से चल सकेगी। ADR जैसे संगठनों को अपनी गतिविधियों पर पुनर्विचार करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी याचिकाएं देश के हित में हों, न कि किसी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए।