रघुकुल की यह परंपरा रही है कि अपने पितृपुरुषों के संकल्प को अपना संकल्प मानकर निर्वाह करते हैं। पितृपुरुषों के संकल्प और आदेश को शिरोधार्य करना, यह हिन्दू रक्त में है। भगवान् श्रीराम ने पिता दशरथ जी के वचन की पूर्ति हेतु वनवास स्वीकार किया तो भगवान् श्री कृष्ण ने मथुरा का राज्य पितरों की परोक्ष आज्ञा से इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनके पुरखे यदु से महाराज ययाति से मथुरा का राज्याधिकार छीन लिया था। सगर पुत्रों को तारने हेतु धरती पर गंगा के अवतरण के लिए सगर, अंशुमान, दिलीप, भगीरथ पीढ़ियों तक हज़ारों वर्षों तक तपस्या करते रहे।
पितरों के संकल्प पूरे करने और उनके उद्धार के लिए तप की यह सनातनी परंपरा निराली है। महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को स्वतंत्र कराने तक पत्तलों में ही खाना स्वीकार किया। महान पुरुषों को अक्सर ऐसे कठोर संकल्प लेने पड़ते हैं। ऐसे लाखों हिन्दू हैं जिन्होंने मन्दिर निर्माण के बाद ही अयोध्या जाएंगे का प्रण ले रखा था, क्योंकि श्रीरामजन्मभूमि पर मिट्टी के टीले और टेंट में श्रीरामलला को देखना हिंदुओं को अपने अस्तित्व पर चोट और भयंकर अपराधबोध व पीड़ा से भर देता था, अपमान का यह दंश उनकी हृदय में एक स्थायी आतंक भर देता था। उनके मुँह से बरबस निकल पड़ता था,
"हर पीर फकीर है कोठी में और राम हमारे तम्बू में।
आखिर अब तक क्यों प्राण हमारे हरे नहीं शिवशम्भु ने!"
अयोध्या के बहुत सेसूर्यवंशी ठाकुरों ने 500 वर्ष तक पगड़ी और चमड़े के चप्पलों का त्याग कर दिया। एक माताजी 30 साल से केवल फलाहार पर रहीं। एक साधु ने भी अन्नत्याग किया था। एक साधु ने मौनव्रत धारण किया था। कोई दशकों तक पत्थर गढ़ता रहा। कोई दशकों तक पवित्र जल इकट्ठे करता रहा। हज़ारों एक आह्वान पर प्राण दे देने से नहीं हिचकते थे। कहीं विजय मन्त्र के करोड़ों अखण्ड जप करवाए तो कहीं अखण्ड रामायण पाठ चलते रहे। कोई जन्मभूमि के बारे में सोचकर श्रीराम! भरी उच्छवास लेकर दो आँसू ही गिरा देता था। उन सबकी आँखों में आज खुशी के दो आँसू हीरे की तरह चमक रहे हैं।
आज जन्मभूमि की बलिवेदी पर मर मिटने वाले भीटी महाराज महताब सिंह जी, राजपुरोहित देवीदीन पाण्डेय जी, हंसवर महाराज रणविजय सिंह जी, रानी जयराज कुमारी जी, स्वामी महेश्वरानंद जी, स्वामी बालरामाचार्य जी, बाबा वैष्णव दास जी, कुँवर गोपाल सिंह जी, ठाकुर जगदम्बा सिंह जी, गजराज सिंह जी, राजा गुरुदत्त सिंह जी, राजकुमार सिंह जी, राजा देवीबख्श सिंह जी, वीर बाबा श्री वैष्णवदास जी, महंत श्री उद्धवदासजी, श्रीरामचरणदास जी, सवाई जयपुराधीश महाराजा श्री जय सिंह जी आदि सब साकेतवासी महापुरुष साकेतधाम से पुष्पवर्षा कर रहे होंगे।
आज जन्मभूमि आंदोलन के पुरोधा ब्रह्मलीन हिंदू हृदय सम्राट श्री अशोक सिंघल जी, ब्रह्मलीन परमहंस महंत श्री रामचन्द्रदास जी महाराज, ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत श्री दिग्विजयनाथजी व परमश्रद्धेय महंत श्री अवेद्यनाथजी महाराज, सर्वभूतहृदय परब्रह्मस्वरूप श्री देवरहा बाबा जी महाराज, नित्यलीलालीन विश्ववन्द्य देवपुरुष श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार महाराज, नित्यलीलालीन जगद्गुरु उडुपी मध्वाचार्य श्री विश्वेशतीर्थजी महाराज, काँची कामकोटि पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती जी महाराज, जगद्गुरु काँची शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज, पूज्य स्वामी श्री सत्यमित्रानंद गिरिजी महाराज, योद्धा साधु बैरागी अभिरामदास जी महाराज, मृदुभाषी स्वामी वामदेव जी महाराज, माननीय भारतरत्न प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी, इतिहासकार श्री सीताराम गोयल जी, श्री रामस्वरूप जी, पुरातत्व के पुरोधा श्री ब्रजवासी लाल जी, आंदोलन कोषाध्यक्ष श्री विष्णु हरि डालमिया जी, श्री गोपालसिंह विशारद जी, तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस जी, जन्मभूमि की प्रस्तावकर्ता राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी, श्री के. के. नैय्यर जी, रामजी के सखा श्री देवकीनंदन अग्रवाल जी, प्रखर वक्ता आचार्य श्री धर्मेन्द्र जी, चित्रकार श्री हुकमचन्द सलूजा जी, रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ के शिल्पकार श्री दाऊदयाल खन्ना जी, श्री ओंकार भावे जी, आचार्य गिरिराज किशोर जी, सांसद श्रीचन्द्र दीक्षित जी, से लेकर
अमर बलिदानियों की अटूट श्रृंखला के मोती श्री राम कोठारी- शरद कोठारी (कोलकाता), श्री महेन्द्रनाथ बहोरि (कानपुर), श्री रमेश पाण्डेय (अयोध्या), श्री रामअचल गुप्ता (बाराबंकी), श्री राजीव दूबे (कानपुर), श्री ओमप्रकाश शर्मा (सीकर), श्री सेठाराम माली (जोधपुर), श्री विनोद कुमार गुप्ता (अयोध्या), श्री भगवानदास जैन (मथुरा), श्री श्यामसुंदर मित्तल (मथुरा), श्री महेन्द्रनाथ अरोड़ा (जोधपुर), श्री फेरई वर्मा (गोण्डा), श्री गंगाराम राजपूत (रत्नागिरी), श्री दिनेशचंद सिन्हा (पटना), श्री भगवान सिंह (अलीगढ़), श्री वासुदेव गुप्ता (अयोध्या), श्री
रघुनंदन जोशी (जयपुर) आदि साकेतविराजित हिन्दू जाति के रक्षक देवताओं का आज देवगण भी हर्षित होकर अभिनन्दन कर रहे हैं। श्रीराममंदिर आंदोलन के लौहस्तम्भ श्रीरामरथसारथी राष्ट्रनायक माननीय श्री लालकृष्ण आडवाणी जी, पण्डित श्री मुरली मनोहर जोशी जी, परमवात्सल्यमयी साध्वी श्री ऋतम्भरा जी, हनुमद्स्वरूप महंत श्री नृत्यगोपालदास जी महाराज जिनके श्रीचरणों में लोट लगाने का दास को सौभाग्य मिला था, जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामभद्राचार्य जी महाराज, स्वामी श्री परमानन्द जी महाराज, श्री रामविलास वेदांती जी, श्री प्रवीण तोगड़िया जी, श्री कल्याण सिंह जी, साध्वी उमा भारती जी, नरशार्दूल श्री विनय कटियार जी, श्री कामेश्वर चौपाल जी, बाबा सत्यनारायण मौर्य जी, श्री जयभगवान गोयल जी, श्री के. पराशरण जी, स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज, श्री चम्पत राय जी, परमभागवत सम्राट श्री नरेन्द्र मोदी जी आज श्रीरामलला की दिव्य छवि को देख अपने जीवन को धन्य अनुभव कर पा रहे हैं।
आज तीन महापुरुष और याद आ रहे हैं, हिन्दुत्व दिग्दर्शक पूज्य श्री विनायक दामोदर सावरकर जी, संघ के संथापक पूज्य श्री केशव बलिराम हेडगेवार जी, और परमपूजनीय श्रीगुरुजी श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जी। युग की धारा को उलट देने वाले आप जैसे महापुरुषों को हिन्दू समाज प्रतिपल स्मरण करता है। और अनन्त ब्रह्माण्डाधिपति अदम्य ब्रह्म स्वराट पुरुष महाशास्ता अनन्तपराक्रमेश्वर धर्मसाम्राज्यप्रसारक परमानन्दघन भगवान् सर्वसाम्राज्यभूपाल श्री रामलला सरकार को आज 5 शताब्दियों के अगणित बलिदानी और, करोड़ों हिन्दू अपलक, अनिमेष निहार रहे हैं।
शंकरजी श्री रामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे। श्री रामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे। देवताओं के सेनापति स्वामि कार्तिक के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से डेढ़ गुने अर्थात बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुंदर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र अपने हजार नेत्रों से श्री रामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं। सभी देवता देवराज इन्द्र से ईर्ष्या कर रहे हैं, और कह रहे हैं कि आज हज़ार नेत्रों वाले इन्द्र के समान भाग्यवान दूसरा कोई नहीं है।
(गोस्वामी श्री तुलसीदासजी, रामचरितमानस)

