भीष्म पितामाह के जीवन की सम्पूर्ण अनसुनी कथा जरूर पढ़े।


नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका भारत आईडिया में तो दोस्तों आज हम बात करने वाले है महाभारत के एक मुख्य पात्र के बारे में जिनका नाम था भीष्म पितामाह।भीष्म पितामाह के बारे में हम सब ने सुना होगा लेकिन उनके जीवनी के बारे में बहुत कम लोग ही जानते होंगे सो आज हम भीष्म पितामाह के जीवनी के ऊपर चर्चा करेंगे। 



भीष्म पितामाह का जन्म :
महाभारत में एक पात्र ऐसा है जिसके बिना महाभारत अधूरी है और वो पात्र है भीष्म पितामाह। भीष्म पितामह के बाल्यकाल का नाम देवव्रत था तथा भीष्म पितामाह के पिता का नाम शांतनु  माता का नाम गंगा था।भीष्म पितामाह के जन्म से पूर्व माता गंगा राजा शांतनु से इस शर्त विवाह करती है की उनको कभी किसी बात के लिए रोका या टोका न जाए और अगर उनको रोका या टोका गया तो वो राजा शांतनु को छोर कर चली जाएँगी, राजा शांतनु बिना किसी झिझक के इस शर्त को मान लेते है। राजा शांतनु तथा माता गंगा के विवाह के बाद इनदोनो की पहली संतान होती है, जिसे माता गंगा गंगा नदी में ही बहा देती और राजा शांतनु शर्त के कारण कुछ नहीं बोल पाते। समय के अनुसार माता गंगा को और राजा शांतनु को क्रमश 7 पुत्र हुए लेकिन माता गंगा ने एक-एक कर को सभी को नदी में बहा दिया और राजा शांतनु शर्त में बंधे होने के कारण कुछ नहीं कर पाए। जब माता गंगा और राजा शांतनु को 8 वा पुत्र होता है और माता गंगा उनको भी नदी में बहाना चाहती है तो राजा शांतनु अपनी शर्त को तोड़ देते है और माता गंगा को 8 वे पुत्र को नदी में बहाने से मना करते है। माता गंगा शर्त टूटने के कारण राजा शांतनु से नाराज हो जाती है और कहती है की मैंने जिन 7 बच्चो को नदी में बहाया वो शापित थे और उनको शाप से मुक्त करने के लिए ही मै उनको नदी में बहा दिया करती थी, साथ ही माता गंगा ने राजा शांतनु को देवी गंगा होने की अश्लियत बताई और कहा की मई अपने 8 वे पुत्र को लेकर जा रही हूँ क्युकी आपने वचन भंग किया है।


भीष्म पितामाह का अपने पिता से मुलाकात :
राजा शांतनु पत्नी माता गंगा और 8 वे पुत्र के बिछरने के कारण हर रोज दुखी मन से गंगा नदी के किनारे जाते थे ताकि उनकी मुलाकात माता गंगा और 8 वे पुत्र से हो जाये। वर्षो बित गए और राजा शांतनु हर रोज किनारे जाते रहे लेकिन एक दिन उन्होंने गंगा तट  हट्टा-कट्टा जवान देखा, तभी माता गंगा प्रकट होती है और राजा शांतनु से कहती है ये कोई और नहीं आपका 8 वा पुत्र है, जिसका नाम देवव्रत है, देवव्रत को सभी वेदो, पुराणों एवं अस्त्र-सस्त्र का ज्ञान है और इनके गुरु कोई और नहीं परशुराम है। यह बात सुनकर राजा शांतनु बहुत प्रसन्न होते है और देवव्रत को अपने साथ हस्तिनापुर लेकर चले जजते है साथ साथ राज्य पहुँचकर राजा शांतनु देवव्रत को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी घोसित कर देते है लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर होता है।

देवव्रत से कैसे बने भीष्म पितामाह :
पिछले पृष्ठ में हमने आपको सत्यवती के बारे में बताया था, जिनसे राजा शांतनु को प्रेम हो जाता है लेकिन सत्यवती राजा शांतनु से विवाह करने से मना कर देती है कारन ये बताते हुए की अगर उनका विवाह राजा शांतनु से होता भी है तो उनके पुत्र राजा नहीं बन पाएंगे क्युकी राजा शांतनु ने पहले ही देवव्रत को उत्तराधिकारी घोसित कर दिया है। राजा शांतनु सत्यवती के इस फैशले से काफी आहत होते है और दुखी रहने लगते है। जब देवव्रत को इन बातो का पता चलता है तो वो सत्यवती से मिलते है और कहते है की मुझे सिंहशान को कोई लोभ नहीं है इसलिए मै प्रतिज्ञा लेता हूँ की मै कभी सिंहशान पर नहीं बैठूंगा तथा जीवन भर अविवाहित रहकर राज्य की सेवा करूँगा। देवव्रत की इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण इनका नाम भीष्म परा तथा देवव्रत को अपने पिता की तरफ से प्रतिज्ञा के कारण इच्छा मृत्यु का भी वरदान मिला।


भीष्म पितामह के 5 चमत्कारी बाण 
चमत्कारी बाण से पहले आपको दुर्योधन का पांडवो को वचन के बारे में जानना होगा, जैसा की आपको पता है कि महाभारत से पहले पांडव अपना वनवास काट रहे थे और दुर्योधन पांडवो को परेशान करने के लिए जंगल में उनके शिविर से थोड़ी दुरी पर अपना भी शिविर लगाता है। एक दिन दुर्योधन अपने सभी साथियो के साथ पास के एक झील में स्नान करने के लिए जाते है और उसी वक़्त वहां गंधर्वदेश के राजा चित्रसेन का वहाँ आगमन होता है, दुर्योधन को वहाँ पाकर चित्रसेन झील को अपना इलाका बताते हुए दुर्योधन को वहाँ से चले जाने को कहते है लेकिन दुर्योधन घमंड में चूर कहता है की, मै हस्तिनापुर का राजा हूँ और मुझे कोई हुक्म नहीं दे सकता तब राजा चित्रसेन दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारते है। दुर्योधन एक छोटी सी टुकड़ी के साथ था और चित्रसेन की सेना बरी थो सो परिणाम स्वरुप दुर्योधन चित्रसेन से परास्त हो जाते है। कुछ सैनिक इस खबर को युधिष्ठिर तक पहुंचाते है जिसके बाद युदिष्ठिर अपने छोटे भाई अर्जुन को भेजते है, अर्जुन चित्रसेन से मिलते है और कहते है की मै युधिष्ठिर का छोटा अनुज हूँ। चूँकि चित्रसेन और युधिष्ठिर अच्छे मित्र होते है इसलिए चित्रसेन दुर्योधन को माफ़ कर देते है।दुर्योधन खुद को मुक्त पाकर प्रसन्न होता है और पांडवो से कहता है की मै आपलोगो का एक वचन पूरा करूँगा बोलो आपलोगो को क्या चाहिए तब युधिष्ठिर कहते है की अभी नहीं हम समय आने पर मांगेंगे।

अब आगे सुनिए जब महाभारत का युद्ध चल रहा था और कौरवो की और से सेना का नेतृत्वा पितामाह भीष्म कर रहे थे तब एक शाम को युद्ध के बाद दुर्योधन पितामह भीष्म को अपने कक्छ में बुलाता है और कहता है की आप मन से कौरवो के लिए नहीं लड़ रहे है, आपका अभी भी लगाओ पांडवो से है, दुर्योधन की ये बात सुनकर पितामह भीष्म क्रोधित होगये और अपने 5 दिव्यअस्त्र बाणो को निकलकर कहते है की इन 5 बाणो से कल 5 पांडवो की मृत्यु होगी। दुर्योधन पितामह भीष्म की इन बातो को सुनकर प्रसन्न हो जाता है और उनसे वो 5 बाण लेकर रख लेता है और कहता है की कल युद्ध से पूर्व आप ये बाण मुझसे ले लीजियेगा ( दुर्योधन को ऐसा दर होता है की कही पितामाह भीष्म का मन बादक न जाये इसलिए वो उनसे बाण लेकर अपने पास रख लेता है )

ये पूरी बात भगवान श्रीकृष्ण को पता चलती है जिसके बाद भगवान श्रीकृष्ण इस कठिनाई से बहार निकलने के  तरकीब लगाते है और युधिष्ठिर को बुलाते है और कहते है की दुर्योधन ने आप से कुछ वर्ष पूर्व जब आप वनवास काट रहे थे तो एक वचन पूरा करने की बात कही थी सो अब उस वचन को मांगने का समये आगया है। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को साड़ी बाते बताई और कहा की उस एक वचन के अनुसार आप जाकर दुर्योधन से वो 5 बाण मांगलो, युधिष्ठिर वैसा ही करते है और जाकर दुर्योधन से वो 5 बाण मांग लेते है। चुकी दुर्योधन वचन बद्ध था सो ना नहीं कर पाता है और इस प्रकार से पांडवो की जान भीष्म पितामह के 5 चमत्कारी बाणो से बचती है।


भीष्म पितामह की मृत्यु :
राजा शांतनु की सत्यवती से विवाह के बाद इनदोनो को दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचितवीर्य। राजा शांतनु की मृत्यु जल्द ही होगयी जिसके बाद सिंहासन रिक्त हो गया और चित्रांगद और विचितवीर्य इतने छोटे थे की राज्य चला नहीं सकते थे सो पितामह भीष्म ने बिना गद्दी पर बैठे राज्य को संभाला, बाद में चित्रांगद जब बरे हुए तो उन्हें हस्तिनापुर का नया राजा बनाया गया जिसे एक अन्य राजा चित्रांगद ने युद्ध में मार दिया। राजा चित्रांगद की मृत्यु के बाद विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया जोकि हर वक़्त मदिरा के नशे में डूबे रहते थे।

कुछ समय बीतने के बाद काशी के राजा ने अपने तीन पुत्रियो के लिए स्वयंवर रखा और उसमे हस्तिनापुर को संदेश नहीं भेजा गया क्युकी राजा विचित्रवीर्य के स्वाभाव से सब परिचित थे। जब ये बात भीष्म पितामाह को पता चली तो वो काफी क्रोधित हुए और कशी जाकर भीष्म पितामह ने हहाकार मचा दिया और राजा के तीनो पुत्रियो का अपहरण कर उन तीनो का विवाह विचित्रवीर्य से तये कर दिया। उन तीनो अपहरित राजकुमारियों में से एक राजकुमारी का नाम अम्बा था जिन्होंने इस विवाह का विरोध किया और कहा की वो की मै महाराज साल्व से प्रेम करती थी और उनको मैंने अपना जीवन साथी चुन लिया था लेकिन आपके इस दुर्व्यह्वार से सब ख़त्म होगया इसलिए अब आपको मुझसे विवाह करनी होगी। पितामाह ने राजकुमारी अम्बा से कहा की वो जीवनभर अविवाहित रहने के लिए वचन वद्ध है इसलिए वो उनसे विवाह नहीं कर सकते। इस बात से आहात होकर राजकुमारी अम्बा भगवान शिव का तप करती है और खुद के लिए न्याय मांगती है, तब भगवान शिव राजकुमारी अम्बा को ये वचन देते है की अगले जन्म में तुम्ही पितामह भीष्म की मृत्यु का कारण बनोगी। वरदान मिलने के बाद  राजकुमारी अम्बा अपना शरीर त्याग देती है और महाराज द्रुपद के यहाँ शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म लेती है जोकी आधे नर तथा आधी नारी का स्वरुप होती है।

कुछ वर्ष बाद जब कौरवो और पांडवो का भीषण युद्ध चल रहा होता है और कौरवो की और से सेना का नेतृत्व पितामह भीष्म कर रहे होते है। पितामाह भीष्म पांडवो पर इस कदर भारी पर रहे थे की मानो वो जल्द ही युद्ध समाप्त कर कौरवो को जित दिला देंगे। पांडवो को युद्ध में जित के लिए पितामह भीष्म की मृत्यु सुनिश्चित करनी थी और इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण एक तरकीब सोचते है और शिखंडी को पितामाह भीष्म के सामने युद्ध के मैदान में खड़ा कर देते है, चुकी शिखंडी आधा नर था इसलिए युद्धभूमि में आ सकता था और आधी नारी होने के कारण पितामह ने उसपर हमला करने से मन कर दिया था। इस प्रकार शिखंडी अर्जुन की ढाल बनती है और उसकी आड़ में अर्जुन पितामाह को बाणो की सैया पर सुला देते है और इस प्रकार से अम्बा का बदला पूरा होता है।


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