सुप्रीम कोर्ट में वो हुआ जिसकी आशंका लंबे समय से थी। एक वकील-याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप, जो खुद अपनी पैरवी कर रहे थे, जजों की बेंच को बोल बैठे - "मैं ACP के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देता हूँ क्योंकि मैं Sovereign हूँ!" न्यायमूर्ति वी. विश्वनाथन ने पूछा - "क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?" जवाब में उसने कोर्ट रूम में कागज हवा में उछाल दिए और भारत के मुख्य न्यायाधीश के लिए बेहद गंदी, अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया... "ये दे देना मा CJI को..."
अब सवाल ये नहीं है कि उसने ये किया क्यों? सस्ती पब्लिसिटी के लिए या फिर गुस्से में आकर? सवाल ये है कि न्यायालय अब इतना सम्मान खो चुके हैं कि एक वकील कोर्ट में इस हद तक पहुँच गया!एक नजरिया कह रहा है - ये ट्रॉमा है, Delayed Justice का गुस्सा है। दूसरा नजरिया कह रहा है - युवाओं में पेशेंस नहीं बचा, फिल्मी सीन जैसी उम्मीद करते हैं। कानून का काम धीमा ही होता है, "देर से जस्टिस भली, कभी जस्टिस न मिलने से बेहतर।"
लेकिन सच्चाई ये है कि दोनों ही नजरिए आधे-अधूरे हैं। असली समस्या है - सालों-साल लंबित केस, न्याय की रफ्तार कछुए जैसी, आम आदमी का सालों इंतजार और महंगे वकीलों का खेल! न्यायपालिका का सम्मान इसलिए गिर रहा है क्योंकि लोग अब इंसाफ की उम्मीद नहीं रखते। जब कोई भरोसा टूटता है, तो गुस्सा फूटता है।
ये घटना कोई isolated incident नहीं है। ये सिस्टम की चीख है।
- - लाखों केस पेंडिंग
- - सालों तक सुनवाई नहीं
- - गरीब-मध्यम वर्ग का न्याय महंगा और दूर
- - और ऊपर बैठे लोग कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं कि आम आदमी को लगता है "सब अपना-अपना खेल खेल रहे हैं"
न्यायपालिका को सम्मान चाहिए तो पहले खुद को सुधारो। फास्ट ट्रैक कोर्ट बढ़ाओ, पेंडिंग केस साफ करो, जजों की संख्या बढ़ाओ और सबसे जरूरी - जनता का भरोसा वापस लाओ! ये वकील गलत था, उसकी भाषा घृणित थी, उसे सजा मिलनी चाहिए। लेकिन सिर्फ उसे सजा देकर समस्या हल नहीं होगी। अगर न्याय समय पर नहीं मिलेगा तो ऐसे ड्रामा रोज होंगे! क्या कहते हो? क्या अब समय आ गया है न्यायिक सुधारों का? या फिर हम बस ऐसे ही देखते रहेंगे?

