भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ अब कोई साधारण समस्या नहीं, बल्कि 900 करोड़ रुपये सालाना का संगठित रैकेट बन चुका था। आनंदबाजार पत्रिका की एक खुलासा रिपोर्ट में एक पूर्व बिचौलिए ने चौंकाने वाले दावे किए हैं। उसके अनुसार, सीमा के दोनों तरफ फैले एजेंटों, लाइनमैनों, फर्जी दस्तावेज बनाने वालों और डिजिटल पेमेंट सिस्टम वाले एक बड़े नेटवर्क ने इसे उद्योग का रूप दे दिया था।
उत्तर 24 परगना समेत सीमावर्ती इलाकों में करीब 1000 घाट थे, जहाँ से बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में दाखिल होते थे। रात हो या दिन, BSF की गश्त की जानकारी लीक कर रास्ता साफ किया जाता था। सीमा पार करने के बाद बस-ट्रेन से उन्हें बड़े शहरों तक भेजा जाता था। फर्जी आधार, वोटर आईडी, PAN कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र बनाकर उन्हें भारतीय नागरिक बना दिया जाता था।
प्रति व्यक्ति तय राशि लेकर बंटवारा किया जाता था। सालाना टर्नओवर 800 से 900 करोड़ रुपये तक पहुँच गया था। TMC की ममता बनर्जी सरकार के समय यह पूरा धंधा खुलेआम चलता रहा। स्थानीय नेता, प्रशासन और कुछ तत्वों की मिलीभगत से घुसपैठियों को पनाह मिलती थी। यह न सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा था, बल्कि लोकल रोजगार, कानून व्यवस्था और जनसांख्यिकीय बदलाव का कारण भी बना।
लेकिन अब बदलाव आया है। नवंबर 2025 में मतदाता सूची के विशेष संशोधन अभियान (SIR) और हाल ही में शुभेंदु सरकार के सत्ता में आने के बाद यह अवैध कारोबार लगभग बंद हो गया है। भाजपा सरकार की सख्ती और बढ़ी हुई निगरानी ने बिचौलियों के इस माफिया को करारी शिकस्त दी है।
यह रिपोर्ट TMC के तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति को बेनकाब करती है। ममता सरकार के राज में बांग्लादेशी घुसपैठिए आराम से वोटर लिस्ट में नाम डलवा लेते थे, जबकि हिंदू शरणार्थी परेशान होते थे। भाजपा की सरकार अब सीमा सुरक्षा, NRC और UCC जैसे कदमों से इस गैंग को पूरी तरह समाप्त करने की राह पर है।

