क्रिकेट भारत में केवल एक खेल नहीं, बल्कि नीति, प्रभाव और नेतृत्व का माध्यम भी है। बीसीसीआई दुनिया का सबसे शक्तिशाली क्रिकेट बोर्ड है और उसके फैसले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की दिशा तय करते हैं। अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट को भारत ने जिस तरह अपनाया, वह ऐतिहासिक और प्रशंसनीय है। लेकिन इसी प्रशंसा के बीच एक सवाल लगातार खड़ा होता है—जब अफ़ग़ानिस्तान को हर स्तर पर अवसर मिला, तो नेपाल को आज भी उसी दरवाज़े के बाहर क्यों रखा गया है? नेपाल ने सीमित संसाधनों में जो संघर्ष और जुझारूपन दिखाया है, वह किसी भी उभरती टीम से कम नहीं। यह लेख इसी असमानता, चयनात्मक समर्थन और भारतीय क्रिकेट की नैतिक जिम्मेदारी पर गहन चर्चा करता है।
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1. अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट को मिला भारत का संपूर्ण संरक्षण
यह सच है कि अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट की सफलता के पीछे भारत की बड़ी भूमिका रही है। जब अफ़ग़ानिस्तान के पास न स्टेडियम था, न स्थिर प्रशासन, तब भारत ने उसे “होम ग्राउंड” दिया। देहरादून, लखनऊ और ग्रेटर नोएडा में अफ़ग़ानिस्तान ने अपने अंतरराष्ट्रीय मैच खेले। बीसीसीआई ने उन्हें वह सम्मान दिया, जो कई स्थापित टीमों को भी नहीं मिलता। यह समर्थन केवल खेल तक सीमित नहीं था, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी था कि भारत अपने पड़ोस और मित्र देशों को आगे बढ़ाने में विश्वास रखता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अफ़ग़ानिस्तान इस सहयोग का हकदार था। लेकिन यही मॉडल आगे किसी और के लिए क्यों नहीं अपनाया गया—यही असली सवाल है।
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2. प्रशिक्षण, संसाधन और ढांचे में अफ़ग़ानिस्तान को प्राथमिकता
भारत ने अफ़ग़ान खिलाड़ियों को अपनी अकादमियों में प्रशिक्षण दिया, भारतीय कोचों के साथ काम करने का मौका दिया और आधुनिक क्रिकेट ढांचे तक पहुंच दिलाई। अफ़ग़ान खिलाड़ी भारत में रहकर ही पेशेवर क्रिकेट की बारीकियां सीख पाए। इसके अलावा, भारतीय घरेलू क्रिकेट टीमों के साथ अभ्यास मैचों ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया। यह सब योजनाबद्ध और दीर्घकालिक था। सवाल यह है कि क्या नेपाल के खिलाड़ियों को ऐसी ही संरचित व्यवस्था मिली? जवाब है—नहीं। नेपाल आज भी संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, जबकि भारत उसके ठीक बगल में बैठा है।
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3. IPL और वैश्विक मंच: अफ़ग़ानिस्तान को खुला दरवाज़ा
आईपीएल अफ़ग़ान खिलाड़ियों के लिए गेम-चेंजर साबित हुआ। राशिद खान, नबी और मुजीब जैसे खिलाड़ी आईपीएल के जरिए अंतरराष्ट्रीय सुपरस्टार बने। उन्हें आर्थिक सुरक्षा, विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा और पहचान मिली। भारत ने कभी यह नहीं कहा कि “यह हमारी लीग है, बाहरी खिलाड़ियों की जरूरत नहीं।” फिर सवाल उठता है—नेपाल के खिलाड़ियों को ऐसा मंच क्यों नहीं? क्या प्रतिभा की कमी है? या अवसर की? नेपाल के खिलाड़ियों को कभी गंभीरता से इस लीग के लिए तैयार करने की योजना क्यों नहीं बनी?
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4. 2018 टेस्ट मैच: अफ़ग़ानिस्तान को ऐतिहासिक सम्मान
भारत के खिलाफ अफ़ग़ानिस्तान का पहला टेस्ट मैच केवल एक खेल नहीं था, बल्कि एक प्रतीक था—स्वीकृति का, सम्मान का। भारत ने यह दिखाया कि वह नई टीमों को टेस्ट क्रिकेट जैसे कठिन प्रारूप में मौका देने से नहीं डरता। यह निर्णय साहसी और दूरदर्शी था। लेकिन नेपाल आज भी टेस्ट स्टेटस से कोसों दूर है, जबकि उसने भी वर्षों से निरंतर प्रगति की है। क्या नेपाल को कभी ऐसे ऐतिहासिक अवसर के लिए सोचा गया?
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5. नेपाल क्रिकेट: सीमित साधनों में असीम जज़्बा
नेपाल ने बार-बार साबित किया है कि वह “कमज़ोर टीम” नहीं है। इंग्लैंड जैसी मजबूत टीम के खिलाफ टी20 वर्ल्ड कप में उसका प्रदर्शन उसकी क्षमता का प्रमाण है। नेपाल के खिलाड़ी तकनीकी रूप से मजबूत, फिट और अनुशासित हैं। उनके पास वह जज़्बा है, जो कभी अफ़ग़ानिस्तान की पहचान था। फर्क सिर्फ़ इतना है कि अफ़ग़ानिस्तान को भारत का हाथ मिला, नेपाल को नहीं। यह तुलना असहज है, लेकिन जरूरी है।
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6. भारत-नेपाल क्रिकेट संबंध: अधूरा सहयोग
यह कहना गलत होगा कि भारत ने नेपाल के लिए कुछ नहीं किया। नेपाली खिलाड़ियों को भारत में कुछ प्रशिक्षण सुविधाएं मिली हैं और घरेलू टीमों के साथ सीमित मैच भी खेले गए हैं। लेकिन यह सहयोग टुकड़ों में है, नीति के रूप में नहीं। अफ़ग़ानिस्तान के लिए जो समर्थन संस्थागत था, वह नेपाल के लिए अब तक नहीं दिखता। सवाल यह है—क्या नेपाल प्राथमिकता की सूची में है भी या नहीं?
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7. असमानता क्यों? क्या नीति स्पष्ट है?
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है—क्या बीसीसीआई की कोई स्पष्ट नीति है उभरते देशों के लिए? अगर है, तो नेपाल उस नीति में कहां फिट बैठता है? अगर नहीं है, तो चयनात्मक समर्थन क्यों? अफ़ग़ानिस्तान को मौका देना सही था, लेकिन किसी एक को ऊपर उठाकर दूसरे को नज़रअंदाज़ करना भी गलत है। खेल में यह असमानता भविष्य में भारत की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।
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8. नेपाल को समर्थन: भारत के लिए नुकसान नहीं, लाभ
नेपाल को समर्थन देने से भारत का कुछ नहीं जाएगा। उल्टा, भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ेगी, क्षेत्रीय नेतृत्व मजबूत होगा और दक्षिण एशियाई क्रिकेट को नई ऊर्जा मिलेगी। भारत-नेपाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते पहले से मजबूत हैं। क्रिकेट के जरिए इन रिश्तों को नई पीढ़ी तक ले जाया जा सकता है। फिर भी उदासीनता क्यों?
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9. अफ़ग़ान मॉडल ही क्यों न अपनाया जाए नेपाल के लिए?
अफ़ग़ानिस्तान मॉडल पूरी तरह सफल रहा है—होम ग्राउंड, ट्रेनिंग, लीग एक्सपोज़र, टेस्ट अवसर। यही मॉडल नेपाल पर लागू किया जाए तो अगले 5–7 वर्षों में नेपाल एक मजबूत टीम बन सकता है। प्रतिभा मौजूद है, मेहनत मौजूद है—कमी सिर्फ़ अवसर की है। भारत अगर चाहता है, तो यह बदलाव कल से शुरू हो सकता है।
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10. निष्कर्ष: सवाल सिर्फ़ नेपाल का नहीं, न्याय का है
यह लेख अफ़ग़ानिस्तान के समर्थन के खिलाफ नहीं है—वह पूरी तरह सही और सराहनीय था। लेकिन सवाल यह है कि वही न्याय, वही अवसर नेपाल को क्यों नहीं? क्रिकेट में पक्षपात नहीं, संभावनाओं का विस्तार होना चाहिए। बीसीसीआई को अब यह तय करना होगा कि वह केवल चुनिंदा कहानियां गढ़ेगा या पूरे क्षेत्र को साथ लेकर चलेगा। अफ़ग़ानिस्तान को मौका मिला—तो नेपाल को भी मिलना चाहिए। अब देरी सिर्फ़ अन्याय है।

