अफगानिस्तान में तालिबान ने विश्वविद्यालयों में महिलाओं द्वारा लिखी गई किताबों पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। सोचिए ज़रा — औरत की कलम भी अब तालिबानी आतंकियों को खतरा लगने लगी!
लेकिन हमारे यहाँ बैठे तथाकथित “सेक्युलर” और “लिब्राण्डू” लोग इस पर चुप हैं। 🙄
👉 अगर यही प्रतिबंध किसी हिंदू परंपरा या भारत की सरकार ने लगाया होता, तो ये लोग दिन-रात “फासीवाद, असहिष्णुता” का राग अलाप रहे होते।
👉 लेकिन इस्लामिक कट्टरता की जाहिलियत पर इनकी ज़ुबान सिल जाती है।
ये वही तालिबान है जिसने लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए, महिलाओं को नौकरी से निकाला, घरों में कैद कर दिया और अब उनकी लिखी किताबों तक को बैन कर दिया। यह सिर्फ़ महिलाओं पर हमला नहीं है, बल्कि मानवता और शिक्षा पर सीधा हमला है।
✊ सवाल साफ़ है — क्या यही “सेक्युलरिज़्म” का असली चेहरा है? क्या यही है “महिला अधिकारों” की लड़ाई, जहाँ असली मुद्दे पर सबकी ज़ुबान पर ताला लग जाता है?
🔥 तालिबान की ये सोच पूरी दुनिया के लिए खतरा है। और जो लोग इसकी आलोचना करने से बचते हैं, वो भी उतने ही दोषी हैं।

