दक्षिण एशिया की राजनीति में पिछले एक वर्ष के दौरान बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। विशेषकर अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। इस बदलाव का असर केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव क्षेत्रीय कूटनीति पर भी पड़ा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश, जिनके रिश्ते लंबे समय से तल्ख़ रहे थे, अब एक बार फिर नजदीक आते दिख रहे हैं। यह नजदीकी जहाँ दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक रिश्तों को मज़बूत कर रही है, वहीं भारत के लिए कई गंभीर चिंताओं को जन्म देती है।
1. बांग्लादेश की राजनीति में बदलाव और उसके निहितार्थ
शेख हसीना की सरकार पिछले पंद्रह वर्षों से अधिक समय तक बांग्लादेश की राजनीति पर हावी रही। उनके शासन में बांग्लादेश ने आर्थिक विकास, वस्त्र उद्योग और बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय प्रगति की। लेकिन 2024 में लगातार बढ़ते विरोध, चुनावी धांधली के आरोप और विपक्षी दलों की लामबंदी ने उनकी सत्ता को हिला दिया। अगस्त में उनका पतन हुआ और एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया। यह सरकार लोकतांत्रिक संवाद और सभी राजनीतिक गुटों की भागीदारी पर जोर देती है। लेकिन इस प्रक्रिया ने कट्टरपंथी संगठनों को भी राजनीतिक मुख्यधारा में जगह दिला दी है। यही बदलाव पाकिस्तान के लिए अवसर लेकर आया है, क्योंकि वह लंबे समय से बांग्लादेश में अपनी खोई पकड़ फिर से हासिल करना चाहता था।
2. पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्तों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बने बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्ते शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन और नरसंहार के आरोप लगे, जिससे दोनों देशों के बीच गहरी कड़वाहट बनी रही। इसके बाद के दशकों में बांग्लादेश ने भारत के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए और पाकिस्तान से दूरी बनाए रखी। हालांकि बीच-बीच में रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए, लेकिन वे टिकाऊ नहीं रह सके। हसीना सरकार ने भी पाकिस्तान के प्रति सख्त रवैया अपनाया। लेकिन हसीना के पतन के बाद बने हालात ने पाकिस्तान को यह मौका दिया कि वह बांग्लादेश के साथ नए सिरे से रिश्तों की शुरुआत कर सके।
3. हालिया नजदीकियाँ और बढ़ते आर्थिक रिश्ते
पिछले एक वर्ष में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कई अहम पहलें देखने को मिली हैं। फरवरी 2025 में दोनों देशों के बीच सीधा सरकारी स्तर पर व्यापार शुरू हुआ। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सौदा 50,000 टन चावल का था। इसके अलावा पाकिस्तान की निजी एयरलाइन "फ्लाई जिन्ना" को कराची से ढाका उड़ानों की अनुमति मिली। हाल ही में गृह मंत्री मोहसिन नकवी की ढाका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने राजनयिक और आधिकारिक पासपोर्ट धारकों को वीजा-मुक्त यात्रा की सुविधा पर सहमति जताई। ये सारे कदम इस ओर संकेत करते हैं कि दोनों देश केवल व्यापारिक नहीं बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी अपने रिश्तों को मजबूती देने की राह पर चल पड़े हैं।
4. इशाक डार की ढाका यात्रा और संभावित समझौते
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार की ढाका यात्रा इस नए दौर की सबसे अहम कड़ी मानी जा रही है। यह पहली बार है जब कोई पाकिस्तानी विदेश मंत्री 13 वर्षों बाद आधिकारिक रूप से बांग्लादेश की यात्रा पर गया है। उनकी यात्रा के दौरान व्यापार, मीडिया, संस्कृति और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में चार से पाँच समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा दोनों देश एक संयुक्त कार्य समूह स्थापित करने पर भी सहमत हो सकते हैं, जो व्यापारिक संभावनाओं को बढ़ाने का काम करेगा। यह सब दर्शाता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश अपने रिश्तों को बहुपक्षीय स्तर पर गहराने के लिए गंभीर हैं।
5. कट्टरपंथी ताकतों की वापसी और उसका असर
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने राजनीतिक संवाद के दरवाजे सबके लिए खोल दिए हैं। इसमें विपक्षी दलों के साथ-साथ कट्टरपंथी संगठनों को भी शामिल किया गया है। इशाक डार की यात्रा के दौरान जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश जैसे संगठनों से मुलाकात की खबरें आ रही हैं। यह वही संगठन है जिस पर लंबे समय तक भारत विरोधी गतिविधियों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोप लगते रहे हैं। पाकिस्तान के इस रुख से साफ है कि वह बांग्लादेश में इन कट्टरपंथी ताकतों को समर्थन देने की कोशिश कर रहा है। इससे बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति और सामाजिक संतुलन पर गहरा असर पड़ सकता है।
6. भारत की चिंताएँ और रणनीतिक चुनौतियाँ
भारत के लिए यह स्थिति कई मायनों में चिंता का विषय है। एक ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश का व्यापारिक और कूटनीतिक सहयोग बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर भारत विरोधी संगठनों को बढ़ावा मिलना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक है। खासकर जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान लंबे समय से बांग्लादेशी कट्टरपंथियों के सहयोग की तलाश में रहा है। यदि पाकिस्तान इन ताकतों को बांग्लादेश में मजबूत करता है, तो यह भारत के लिए दो मोर्चों पर दबाव बढ़ा सकता है—पूर्वोत्तर राज्यों में अस्थिरता और कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा। इसलिए भारत को इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नज़र रखनी होगी।
7. दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति
यह घटनाक्रम केवल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में यह बदलाव क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित करेगा। चीन पहले से ही बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों में गहरी पैठ बनाए हुए है। अगर पाकिस्तान-बांग्लादेश की नजदीकियाँ बढ़ती हैं, तो चीन को भी इसका लाभ मिल सकता है। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति और जटिल हो जाएगी। अमेरिका और यूरोपीय देशों की नज़र भी इस पर होगी क्योंकि बांग्लादेश वस्त्र उद्योग और श्रम शक्ति का बड़ा केंद्र है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत किस तरह अपनी कूटनीति से इन चुनौतियों का मुकाबला करता है।
8. बांग्लादेश की जनता और कट्टरपंथ का खतरा
हालांकि पाकिस्तान और कट्टरपंथी संगठन बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश की आम जनता का बड़ा हिस्सा अब भी प्रगतिशील और विकासोन्मुखी सोच रखता है। शेख हसीना के दौर में बांग्लादेश ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कीं, जिससे जनता की उम्मीदें भी बढ़ीं। यदि कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में ज्यादा प्रभावशाली होती हैं, तो यह देश की सामाजिक समरसता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए खतरा बनेगा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश की जनता पाकिस्तान और कट्टरपंथी संगठनों को इतनी आसानी से स्वीकार कर लेगी या विरोध करेगी।
9. भारत की संभावित रणनीति और विकल्प
भारत को इस नई स्थिति से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति बनानी होगी। एक ओर उसे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और जनता से अपने संबंध मज़बूत करने होंगे, वहीं दूसरी ओर उसे क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान की इस नई नीति को उजागर करना होगा। भारत बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर जनता का विश्वास जीत सकता है। साथ ही सुरक्षा सहयोग और खुफिया साझेदारी भी बढ़ानी होगी। यह सुनिश्चित करना भारत के लिए ज़रूरी है कि बांग्लादेश की राजनीति में कट्टरपंथी ताकतें निर्णायक भूमिका न निभा पाएं।
10. निष्कर्ष: बदलते समीकरण और भविष्य की चुनौतियाँ
पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ती नजदीकियाँ दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए नए सवाल खड़े करती हैं। जहाँ दोनों देश व्यापार और कूटनीति के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, वहीं कट्टरपंथी संगठनों की भूमिका भारत और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरे का संकेत है। भारत को चाहिए कि वह सतर्क रहते हुए बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को और गहरा करे तथा जनता-से-जनता संपर्क को मजबूत बनाए। आने वाले समय में यह तय होगा कि बांग्लादेश प्रगतिशील विकास की राह पर चलता है या फिर पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव में आकर क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाता है। यही आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण एशिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
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