आज के दौर में सूचना क्रांति ने जहाँ हमें एक क्लिक में पूरी दुनिया से जोड़ दिया है, वहीं गलत सूचनाएँ और अफवाहें भी उतनी ही तेज़ी से फैलने लगी हैं। हाल ही में टिकटॉक के भारत में वापसी को लेकर अचानक सोशल मीडिया पर खलबली मच गई। किसी ने कथित तौर पर टिकटॉक की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट साझा कर दिया और देखते ही देखते मीडिया चैनलों और मेमर्स ने इस पर कंटेंट बनाना शुरू कर दिया। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सचमुच टिकटॉक की वापसी हुई है? या फिर यह सिर्फ एक और प्रोपेगेंडा और फेक न्यूज़ का हिस्सा था?
फेक न्यूज़ की शुरुआत और टिकटॉक की वापसी की अफवाह
टिकटॉक को भारत सरकार ने जून 2020 में सुरक्षा कारणों से बैन कर दिया था। इस ऐप को चीनी ऐप्स की उस सूची में रखा गया था जो देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरा मानी गई। चार साल बाद अचानक सोशल मीडिया पर एक स्क्रीनशॉट वायरल होने लगा, जिसमें यह दावा किया गया कि टिकटॉक की वेबसाइट भारत में दोबारा एक्सेस हो रही है। इस स्क्रीनशॉट को बिना सत्यापित किए ही कई लोगों ने शेयर करना शुरू कर दिया। यही वह पल था, जब अफवाह ने फेक न्यूज़ का रूप ले लिया।
मीडिया की भूमिका: खबर या सिर्फ टीआरपी का खेल?
फेक न्यूज़ को हवा देने में आज का मीडिया भी पीछे नहीं है। खासकर टीवी चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, जिन्हें सबसे पहले "ब्रेकिंग न्यूज़" दिखाने की होड़ रहती है। टिकटॉक वापसी की खबर पर भी यही हुआ। बिना सरकारी पुष्टि के कुछ मीडिया संस्थानों ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया। उदाहरण के लिए, NDTV और अन्य चैनलों ने इस खबर पर सेगमेंट चलाए और इसे "संभावित वापसी" के रूप में पेश किया।
मेमर्स और एंगेजमेंट फार्मर्स की भूमिका
सोशल मीडिया पर मेमर्स और तथाकथित एंगेजमेंट फार्मर्स भी इस फेक न्यूज़ को बढ़ाने में पीछे नहीं रहे। किसी भी वायरल ट्रेंड पर चुटकुले, मीम्स और मज़ाकिया पोस्ट बनाना उनकी आदत बन चुकी है। टिकटॉक वापसी की अफवाह पर भी उन्होंने तुरंत "क्रिंज कंटेंट" और "इंस्टा रील्स बनाम टिकटॉक" जैसी तुलनाएँ शुरू कर दीं। इन मीम्स का मकसद केवल मज़ाक करना नहीं होता, बल्कि लोगों की भावनाओं को भड़काना और अधिक से अधिक लाइक्स, शेयर और फॉलोअर्स बटोरना होता है।
राजनीति और प्रोपेगेंडा का तड़का
टिकटॉक वापसी की अफवाह को सिर्फ तकनीकी या सोशल मीडिया ट्रेंड के रूप में ही नहीं देखा गया, बल्कि इसे राजनीतिक हथियार भी बनाया गया। सोशल मीडिया पर कुछ समूहों ने इसे मोदी सरकार की "कमज़ोरी" या "नीति विफलता" के रूप में पेश करने की कोशिश की। कुछ यूज़र्स ने "मौलाना मोदी" जैसे तंज कसते हुए प्रधानमंत्री की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया।
जनता के लिए सबक: अफवाह से बचें, सत्य जानें
इस पूरे मामले से आम जनता को सबसे बड़ा सबक यही लेना चाहिए कि किसी भी खबर पर आँख मूँदकर विश्वास न करें। टिकटॉक वापसी की खबर सिर्फ एक स्क्रीनशॉट और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित थी, जबकि हकीकत यह है कि सरकार ने अब तक ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है। सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि टिकटॉक अभी भी भारत में प्रतिबंधित है।

