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आदि शंकराचार्य की 108 फीट की प्रतिमा कितना सार्थक है ये निर्माण?

महाभारत का युद्ध इतिहास को दो हिस्सों में बांटता है। महाभारत से पहले समाज काफी विकसित, प्रगतिशील और शिक्षित था। जबकि महाभारत के बाद समाज बहुत कट्टरपंथी और पिछड़ा हो चुका था। इसका एक बड़ा कारण यह था कि समाज के ज्ञानीजन या तो युद्ध मे मारे गए या उन्होंने सदा के लिये सन्यास ले लिया। गौतम बुद्ध आये और ज्ञान का दीप जलाया हालांकि उनके निर्वाण के साथ ही यह दीप फड़फड़ाने भी लग गया। वे आडम्बरो के विरुद्ध लड़े और अंत मे उन्ही के नाम पर एक धर्म बन गया और बौद्ध धर्म में भी शोषण शुरू हो गया।

जब हिन्दुओ और बौद्धों की वैचारिक लड़ाईया हुई तो दोनों के विद्वानों ने अपने अपने धर्मो में मामूली सुधार भी किये। करीब 1000 वर्ष चले इस शीत युद्ध मे टर्निंग पॉइंट तब आया जब केरल में शंकराचार्य का जन्म हुआ।शंकराचार्य हर बौद्ध राजा के पास जाते और उसके भिक्षुओ को शास्त्रार्थ के लिये चुनौती देते। वे राजा से वचन लेते थे कि यदि शंकराचार्य जीते तो राजा और उसकी समग्र प्रजा हिन्दू धर्म अपनाएगी।

इस तरह शंकराचार्य ने पूरे भारत का भ्रमण किया और एक भी शास्त्रार्थ नही हारे। सिर्फ 31 वर्षो का जीवन जी सके मगर इसी में उन्होंने बौद्ध धर्म का समापन कर दिया। उन्होंने हिन्दू धर्म मे बड़े परिवर्तन किये। शंकराचार्य खुद ब्राह्मण थे मगर उन्होंने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी। उन्होंने 12 ज्योर्तिलिंगों और 4 धाम को बसाया, उन्होंने फिर से शास्त्र लिखे और हर हिन्दू को चाहे वह किसी भी जाति का हो उसे अधिकार दिये कि वो शास्त्रो का पाठन करे।

स्त्रियों के लिये फिर से गुरुकुल भी खोले गए मगर वे बहुत कम आयु में चल बसे उनका जीवन हिन्दू धर्म का नया जन्म था और उनकी मृत्यु ने हिन्दू धर्म को भी अंधकार के पथ पर अग्रसर कर दिया। उनके बनवाये ज्योतिर्लिंगों और धामो को फिर से धार्मिक व्यापार का केंद्र बनाने का प्रयास हुआ। मगर केरल में उनके शिष्यों ने हिन्दू धर्म को नई दिशा दी और दक्षिण भारत मे अनगिनत मंदिर बने। दक्षिणी भारत तब से लेकर आज तक हिन्दू धर्म का गढ़ बना हुआ है।

उत्तरी भारत भी पीछे नही रहा, क्षत्रियो ने अहिंसा त्यागकर देश की रक्षा के लिये शस्त्र उठा लिए। ये कड़ी बप्पा रावल से लेकर आज तक चली आ रही है। जो कुछ हिन्दुओ ने झेला मुझे नही लगता इस संसार मे यहूदियों के अलावा इतना झेलने का सामर्थ्य किसी मे था फिर भी हम बचे रहे। इस विजय में हम आदिगुरु शंकराचार्य का योगदान नही भुला सकते, आदिगुरु की टाइमलाइन उन्हें और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। अरब में इस्लाम का जन्म हो चुका था, अफगानिस्तान में बौद्धों का खात्मा करने आ ही गए थे और हिंदुकुश पहाड़ियों के पीछे हमारा भारत सहमा हुआ था।

यदि थोड़ी देर हो जाती तो कदाचित इस समय मैं ईसाईयों और यहूदियों को कैसे मारना है इस पर लिख रहा होता और आप कमेंट में इंशाअल्लाह लिख रहे होते। लेकिन शंकराचार्य के कारण सब समय पर हुआ और बप्पा रावल के नेतृत्व में भारत ने ऐसे काउंटर अटैक किया कि इस्लामिक आक्रांताओ को उखाड़ फेंका गया। शंकराचार्य बिना लड़े ही 1300 वर्षो से ना जाने कितने युद्ध जीत रहे है। पहले केदारनाथ में उनकी भव्य प्रतिमा बनी जिसका खुद मोदीजी ने अनावरण किया था।

अब उससे भी बड़ी प्रतिमा मध्यप्रदेश में बन रही है, हालांकि राजनीतिक स्तर पर इसे 2023 के विधानसभा चुनाव और पर्यटन बढ़ाने के लिये बनवाया जा रहा है। वैसे आग्रह करूँगा की शंकराचार्य को कट्टरता से ना जोड़े उनका सबसे ज्यादा विरोध हम ने ही किया था जब उन्होंने महिलाओं की शिक्षा का समर्थन किया था। जब उन्होंने ज्योतिर्लिंग बसाए तब भी उनका विरोध हुआ क्योकि धर्म के ठेकेदारों को लगता था कि ऐसा करने से लोग खुद को भगवान से जोड़ लेंगे और कर्मकांडो का मूल्य घट जाएगा।

लेकिन शंकराचार्य नही रुके, भारत के राजा उनसे इतने प्रभावित थे कि कई जगह तो राज सेना उनकी रक्षा के लिये नियुक्त की गई थी। आज उनके स्मारक बन रहे है और उनके विरोधियों के तो किसी को नाम भी नही याद है। आखिरकार सत्य को कौन रोक सकता था। जिन्हें ये प्रतिमा बस एक खर्च लग रही है वे कृपया इसे वेबसाइट पर देखें।