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पत्रकार और पत्रकारिता को डर किस से ?

हिन्दी में मुख्यधारा के लेखक, पत्रकार और बौद्धिक इस्लाम की आलोचना करने से इतना डरते क्यों हैं? इस मनोवैज्ञानिक रूढ़ि का क्या कारण है? 

यहाँ तक तो मुझे समझ में आता है कि मुसलमान भारत में अल्पसंख्यक हैं और उनकी किसी भी तरह की निंदा आपको बौद्धिक रूप से बहुसंख्यकवादी राजनीति के ब्रैकेट में ला खड़ा करती है और इसको वो मानवद्रोह समझते हैं। फ़ेयर इनफ़। लेकिन दुनिया में तो मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं, दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यक हैं और तेज़ी से सर्वाधिक आबादी वाला समुदाय बनने की ओर अग्रसर हैं। वे नि:शक्त भी नहीं हैं, उनके पास भरपूर ताक़त है, पचास से ज़्यादा मुल्क हैं, तेल की धार है, चीन नॉर्थ कोरिया रूस की शह है और लिबरल कम्युनिटी का बौद्धिक प्रश्रय है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो दुनिया में हिंदू, बौद्ध और यहूदी समुदाय मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक दुर्बल, नियतिवंचित और 'सबाल्टर्न' हैं, तब वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी वे इस्लामिक नैरेटिव का ही समर्थन करते क्यों मालूम होते हैं?

इज़राइल पर हमास के ताज़ा हमले का मामला ही ले लें! वह 'क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी' की श्रेणी में आता है। अत्यंत बर्बर हमला था, जिसमें निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया गया, बुज़ुर्गों को घर में घुसकर मारा गया, मासूम बच्चों का क़त्ल उनके ही परिजनों के सामने किया गया और औरतों को नग्न करके घुमाया गया। इसमें ज़मीन विवाद नहीं नस्ली नफ़रत झलक रही थी। मणिपुर में जब दो औरतों को नग्न करके घुमाया गया था तब तो लिबरल चेतना क्रंदन कर उठी थी। अब लगता है उसके क्रंदन के पीछे करुणा कम और राजनीति अधिक थी, क्योंकि भाजपा शासित राज्य में हिंदू मैतेइयों ने ईसाई आदिवासियों पर अत्याचार किया, यह कहानी उनके नैरेटिव में फिट बैठती थी। 

जिस किस्म का हमला हमास ने इज़राइल पर किया, वैसा ही अगर अश्वेतों, दलितों, आदिवासियों या भारत के अल्पसंख्यकों पर होता तो बौद्धिक वर्ग सामूहिक विलाप कर बैठता। लिबरलों की छोड़ें, नारीवादियों से ही पूछें कि यहूदी औरतों पर हुए अत्याचार से उनकी चेतना क्यों आंदोलित नहीं हुई? उलटे कई बौद्धिकों ने तो किंतु परंतु के व्याकरण में यह कहते हुए हमास के आक्रमण को जायज़ ठहराने की कोशिश की कि इज़राइल लम्बे समय से फ़लस्तीनियों पर ज़ुल्म कर रहा है, उनकी मस्जिद को अपवित्र कर रहा है, वे बदले में प्रतिक्रिया तो करेंगे ही। एक बौद्धिक ने कहा कि फ़लस्तीनियों ने तय कर लिया कि जब मरना ही है तो मारकर मरेंगे। ये मिठुन चक्रबर्ती शैली के संवाद हमारे लिबरलान कब से बोलने लगे कि मारकर मरेंगे? 2002 में तो उन्होंने नहीं कहा था कि रेलगाड़ी जलाई गई थी, जिसके जवाब में दंगे हुए? उग्र हिन्दू राष्ट्रवाद के उदय के ऐतिहासिक मनोवैज्ञानिक कारणों को तो उन्होंने कभी टटोला नहीं, फिर फ़लस्तीनियों की हिंसा को ही न्यायोचित ठहराने की ज़रूरत उन्हें क्यों महसूस होती हैं? क्या यह बौद्धिक बेईमानी नहीं है?

जबकि इस्लाम की शान में ग़ुस्ताख़ी हरगिज़ न की जावे, ऐसा कोई नियम वैश्विक बौद्धिकता ने अपने पर नहीं लाद रखा है, यह केवल भारत के आत्महीन और रीढ़हीन बुद्धिजीवियों का ही शगल है। इटली की प्रसिद्ध पत्रकार ओरियाना फ़लाची, जो किसी भी स्त्री पत्रकार की आदर्श हो सकती हैं, अपने निर्भीक इंटरव्यूज़ के लिए पूरी दुनिया में चर्चित थीं। उन्होंने इस्लामिक चरमपंथ की खुलकर आलोचना की है और यह तक कह दिया है कि 'मॉडरेट इस्लाम' जैसी कोई चीज़ नहीं होती।

वी.एस. नायपॉल नोबेल पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार हैं, इस्लाम के धुर आलोचक रहे हैं। भारत में इस्लाम की आलोचना करने वाले को गली मोहल्ले का साहित्य सम्मान भी नहीं मिलता, हिन्दी के लेखक उसको जात बाहर कर देते हैं, हुक्का पानी बंद कर देते हैं, और नायपॉल नोबेल ले आया। इसी तरह, सलमान रूश्दी बीते पच्चीस तीस सालों से नोबेल का दावेदार है और इस्लाम का आलोचक है। 

रिचर्ड डॉकिन्स, जो कि चार्ल्स डार्विन के बाद दुनिया का सबसे चर्चित एवल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट है, इस्लाम का आलोचक है। प्रसिद्ध फ़ेमिनिस्ट एक्टिविस्ट अयान हिरसी अली ख़ुद मुसलमान होकर इस्लाम की आलोचना करती हैं। नरगिस मोहम्मदी ने अभी हाल में नोबेल जीता, उन्होंने इस्लामिक स्त्रीद्वेष का प्रतिकार किया था। प्रसिद्ध लेखक मार्टिन एमिस इस्लाम की निंदा करते थे। 

भारत में नीरद चौधुरी से लेकर निर्मल वर्मा तक इस्लाम के आलोचक रहे। निर्मल वर्मा जैसे प्रथम श्रेणी के लेखक चिंतक को हिन्दी के होनहारों ने इस गुनाहे अज़ीम के लिए भाजपाई क़रार दे दिया। उनको लगता है कि इस्लाम की आलोचना वो ही करेगा, जो संघी भाजपाई होगा। लेकिन स्वयं शरतचंद्र चट्टोपाध्याय इस्लाम के कटु आलोचक थे, उन्होंने हिन्दू मुसलमान साम्प्रदायिक संकट पर एक सुचिंतित निबंध लिखा है। बंगाल के गाँव गाँव, शहर शहर की ख़ाक छानने वाला यह आवारा मसीहा ज़मीनी हक़ीक़तों को बहुत क़रीब से जानता था। और तो और, डॉ. भीमराव आम्बेडकर तक ने इस्लाम में निहित विस्तारवाद और असहिष्णुता पर पैनी दृष्टि डाली है।

ये तमाम मुख्यधारा के लेखक, साहित्यकार, बौद्धिक हैं। क्यों ना होंगे? ये नियम भला किसने और कब बनाया कि आप पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, उपभोक्तावाद, नात्सीवाद, बहुसंख्यकवाद, हिन्दुत्व आदि की मुखर आलोचना करेंगे, लेकिन इस्लामिक विस्तारवाद रूढ़िवाद का प्रश्न आते ही चुप्पी साध लेंगे? अगर ऐसा कोई लिखित अलिखित नियम कहीं पर मौजूद हो तो कृपया मुझे अवगत करावें, उससे मेरा ज्ञानोदय होगा। पता तो चले कि आखिर समस्या क्या है?

मैं ये नहीं कहता कि हिन्दू राष्ट्रवादियों की तरह चौबीसों घंटे किसी जाति समुदाय में मीनमेख निकालो, उसका जीना हराम कर दो और उसको नीचा दिखाओ। पर जहाँ पर समस्या है, जहाँ स्पष्ट क्रूरता, नृशंसता, अन्याय के दर्शन हो रहे हैं, वहाँ तो बोलो। किस बात का डर है? कौन तुम्हारे इनाम इक़राम, ग्रांट फ़ैलोशिप रोक देगा? कौन ​तुम्हारी किताबों के रिव्यू ब्लर्ब लिखना बंद कर देगा? कौन तुम्हारे 'राइटिंग कॅरियर' को नुक़सान पहुँचा देगा? और अगर ऐसा होता है तो भी क्या? बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं बोलोगे, मियाँ? इतना ही डरते हो तो गेहूँ का गोदाम खोल लो, यह लेखन चिंतन की दुनिया में तुम कैसे चले आए, लेखन तो निडर, निर्भीक और स्वतंत्रचेता बौद्धिकों पर ही सजता है, बिकाऊ, डरपोक और बेईमान नैरेटिवबाज़ों पर नहीं! इति!