एनडीटीवी की प्रकांड बुद्धिजीवी?? पत्रकार के साथ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के नाम से एसोशिएट प्रोफेसर पद का झूठा ऑफर देकर हुए कांड से पाकिस्तान का रिटायर्ड सैनिक अधिकारी हबीब याद आ गया।अब सवाल उठता है की आखिर लेफ्टनंट कर्नल हबीब है कौन? भारतीय उद्योगपति कुलभूषण जाधव का ईरान से अपहरण करके उन्हें पाकिस्तान ले जाने के षड्यंत्र का प्रमुख था पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी हबीब।
श्री जाधव को पाकिस्तान ले जाकर उन्हें भारतीय जासूस घोषित करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को नीचा दिखाने योजना थी। उसी योजना के अनुसार सारा काम हुआ और आगे का सारा नाटक आप जानते है। इस अपहरण के कुछ समय बाद हबीब सेना से सेवानिवृत्त हो गया और निवृत्ति के बाद कोई छोटा मोटा काम ढूँढने लगा। इसके लिए उसने लिंक्डइन पर अपना सीवी डालकर लिखा कि वो यूनओ (UNO) के लिए काम करने के लिए इच्छुक है।
कुछ दिनों बाद उसे मार्क नाम के किसी व्यक्ति का फोन आया जिसने बताया कि नेपाल में UNO को एक प्रोजेक्ट के लिए सैन्य पेशे का अनुभव होने वाले व्यक्ति की आवश्यकता है। साथ ही उस प्रोजेक्ट के लिए हबीब को वाइस प्रेसिडेंट के पद पर चुने जाने की खबर दी। मेल पर ही सारे डिटेल्स जैसे काम का स्वरूप, पगार आदि तय हुआ और उसे कहा गया कि उसे इंटरव्यू के लिए काठमांडू आना पड़ेगा।
इसके लिए 6 अप्रेल 2017 को काठमांडू पहुंचना होगा कहकर उसे लाहौर ओमान काठमांडु का हवाईजहाज का टिकट भेजा गया। ओमान में उतरने के बाद उसे कुछ नेपाली रुपये, दो मोबाईल और नेपाली सिमकार्ड दिया गया। ये लेकर वो काठमांडू के लिए रवाना हुआ। काठमांडू में उतरने के बाद उसने अपनी बेगम को व्हाट्सएप पर एक सेल्फी भेजकर बताया कि अब वो लुम्बिनी के लिए अगला जहाज पकड़ रहा है।
लुम्बिनी में उतरकर उसने फिर बेगम को मैसेज करके बताया कि वो ठीक से पहुँच गया है। उसके बाद उसका फोन बंद हो गया। नेपाल के लुम्बिनी शहर से भारत की सीमा मात्र 5 किलोमीटर दूर है। हबीब को टिकट, पैसा और सिम देनेवाले मार्क का नम्बर भी बन्द हो गया जो बाद में फेक साबित हुआ। हबीब को अपना जॉब प्रोफ़ाइल अपलोड करने का कहने वाली साइट भी डिलीट हो गयी और लुम्बिनी में उसका होटल बुकिंग करने वाले भी कभी पकड़े नहीं गए। इतना ही नहीं, हबीब कभी होटल पहुँचा ही नहीं।
पाकिस्तान सरकार ने जब भारत से पूछा कि क्या हबीब उनके पास है तो भारत ने साफ इंकार कर दिया जिससे तिलमिलाकर पाकिस्तान के सैन्य कोर्ट ने चार दिन बाद अर्थात 10 अप्रेल 2017 को कुलभूषण को फाँसी की सजा सुना दी। जिसके विरुद्ध अंर्तराष्ट्रीय कोर्ट में कानूनी कारवाई चल रही है।
तो मुद्दा ये है कि खुद को जरा ज्यादा समझने वालों के साथ ऐसा होता है। निधि की किस्मत अच्छी है कि किसी ने "लुम्बिनी" का टिकट देकर उसे गायब नहीं किया। अब जाँच एजेंसियों के पास नया सरदर्द आ गया कि निधि को किस मिस्टर ने फोन किया!! जो भी हो, इस पूरे प्रकरण से भारतीय भाषाओं को एक नई कहावत मिल गयी एक "निधि राजदान होना" या "उसकी तो निधि राजदान हो गयी!!!" अध्यक्ष महोदय, निवेदन है कि भारतीय भाषाओं को यह अमूल्य योगदान देने के लिए 2022 का पद्म भूषण दिए जाने की मेल की जाए अध्यक्ष महोदय!

