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    आज के दिन संघ ने देश के लिए दिया था एक बरा बलिदान, जिसे जान आपकी आंखे नम हो जाएँगी।



    नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका भारत आइडिया में, तो दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जिस पर हमेशा से यह सवाल उठता आया है कि क्या सच में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक राष्ट्रभक्त संगठन है?... लेकिन संघ ने हर परिस्थिति में खुद को मजबूत किया और यह दर्शाया कि संघ के हर एक व्यक्ति में देश भक्ति का जज्बा है.तो दोस्तों आज 27 नवंबर है और आज ही के दिन संघ ने देश के लिए एक बहुत बड़ा योगदान दिया था और आज हम उसी पर चर्चा करेंगे.


    अक्सर कुछ तथाकथित नकली देश भक्ति के रंग में रंगे लोगों से सुना जाता है कि संघ ने देश के लिए क्या किया है?.. उनसे सवाल किया जाता है कि वीर सावरकर जी के बारे में, लेकिन संघ खामोशी से सब सुनकर श्रीमद्भागवत गीता के सिद्धांत पर अपना रास्ता तय करती है कि कर्म कर फल की चिंता मत कर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मजहबी सोच वाले पाकिस्तान ही नहीं बल्कि चीन के साथ युद्ध में भी अपना भरपूर योगदान दिया था और यह बताया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश हित के लिए काम करता है ना कि देश अहित के लिए.हमने हमेशा देखा है कि भारत की संस्कृति से चिढ़ने वाले विदेशी संस्कृति को थोपने वाले लोगों के निशाने पर  संघ रहा है लेकिन आप सब की जानकारी के लिए हम आपको बताना चाहेंगे कि 1947 में नवनिर्मित पाकिस्तान ने कश्मीर को हासिल करने के लिए भारत पर हमला कर दिया था और इस हमले में देश रक्षा के दीवाने संघ के स्वयंसेवकों ने उनका प्रबल प्रतिकार किया.उन्होंने भारतीय सेना, शासन तथा जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह को इन षडयंत्रो कि समय पर सूचना दी. इस गाथा का एक अमर अध्याय 27 नवंबर 1948 को कोटली में लिखा गया जो इस समय पाक अधिकृत कश्मीर में है और आज हम आपको इसी अध्याय के बारे में बताएंगे.

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    Bharat Idea

    युद्ध के समय भारतीय वायुयान द्वारा फेंकी गई गोला बारूद की कुछ पेटियां शत्रु सेना के पास जा गिरी, उन्हें उठाकर लाने में बहुत जोखिम था.वहां नियुक्त कमांडर अपने सैनिकों को गवाना नहीं चाहते थे अतः उन्होंने संघ कार्यालय में संपर्क किया. उन दिनों स्थानीय पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंधक श्री चंद्रप्रकाश जी कोटली में नगर कार्यवाह थे.उन्होंने कमांडर से पूछा कि कितने जवान चाहिए?.. कमांडर ने कहा 8 से काम चल जाएगा चंद्र प्रकाश जी ने कहा एक तो मैं हूं, बाकी सात को लेकर आधे घंटे में आता हूं .चंद्र प्रकाश जी ने जब स्वयंसेवकों को यह बताया तो एक दो नहीं 30 युवक इसके लिए प्रस्तुत हो गए. कोई भी देश के लिए बलिदान होने के इस शुभ अवसर को गवाना नहीं चाहता था .चंद्र प्रकाश जी ने बड़ी कठिनाई से 7 को छाटा पर बाकी भी जिद पर अड़े थे अतः उन्हें आज्ञा देकर वापस किया गया.सब ने अपने 8 साथियों को सजल नेत्रों से विदा किया.




    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 8 कार्यकर्ता युद्ध भूमि में पहुंच चुके थे,फिर सैनिक कमांडर ने उन आठो को पूरी बात समझाई.भारतीय सेना और शत्रु सेना के बीच एक नाला था जिसके बाद पेटियां पड़ी थी.शाम का समय था सर्दी के बावजूद स्वयंसेवकों ने तैर कर नाले को पार किया तथा पेटियां अपनी पीठ पर बांधली. इसके बाद वे रेंगते हुए अपने क्षेत्र की ओर बढ़ने लगे पर पानी में हुई हलचल और शोर से शत्रु सैनिक सजग हो गए और गोली चलाने लगे. इस गोली वर्षा के बीच स्वयंसेवक आगे बढ़ते रहें पर इसी बीच श्री चंद्रप्रकाश और श्री वेद प्रकाश को गोली लग गई. इस और ध्यान दिए बिना बाकी छह स्वयंसेवक नाला पार कर कर सकुशल अपनी सीमा में आ गए और कमांडर को पेटीया सौंप दी.अब अपने घायल साथियों को वापस लाने के लिए फिर नाले को पार कर शत्रु सीमा पर पहुंच गए,उनके पहुंचने तक उन दोनों वीर स्वयंसेवकों के प्राण पखेरू उड़ चुके थे. स्वयंसेवक ने उनकी लाश को अपनी पीठ पर बांधा और लौट चलें यह देख शत्रुओं ने गोली बरसात तेज कर दी इससे एक स्वयंसेवक और मारा गया.




    अब तक तीन स्वयंसेवक मारे जा चुके थे इसी बीच एक अन्य स्वयंसेवक की कनपटी पर पाकिस्तान की सेना की गोलियां लगी और इस तरह से चार स्वयंसेवक शहीद हो गए.यह दृश्य काफी करुणानिक था करुणानिक इसलिए क्योंकि चार स्वयंसेवक अपने चार साथियों को अपनी पीठ पर बांधे हुए नाले को पार कर रहे थे. बचे हुए चावल सेवक जैसे-तैसे अपने 4 मित्र साथियों को नाले के पार लाते हैं .जब 4 शहीद स्वयंसेवकों की मृत शरीर चिता पर रखी गई तो भारत माता की जय के निशाद से आकाश गूंज उठा था. नगर वासियों ने फूलों की वर्षा की इन स्वयंसेवकों का बलिदान रंग लाया उन पेड़ों से प्राप्त सामग्री से सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों पर उत्पात मचा दिया तथा उनका उत्साह भी बड़ा वेब भूखे शेर की तरह शत्रु पर टूट पड़े कुछ ही देर में शत्रुओं के पैर उखड़ गए और चिता की राख ठंडी होने से पहले ही पहाड़ी पर तिरंगा फहराने लगा सेना के साथ प्रातः कालीन सूर्य ने भी अपनी पहली किरण चिता पर डालकर स्वयंसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित की.