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नमस्ते से अभिवादन करने का क्या फायदा

 रोज हम किसी ना किसी से मिला करते हैं तो हम किस प्रकार अभिवादन करते हैं . हमारी भारतवर्ष की क्या परंपरा रही है ?
आइए जानते हैं। 


जब हम किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते करते हैं, यही हमारी परंपरा रही है।  
 इससे सभी उंगलिया एक दूसरे के संपर्क में तो आते हैं,साथी उस पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों कानों और दिमाग पर होता है। जिसका परिणाम हम सामने वाले व्यक्ति को लंबे समय तक याद रख पाते हैं। दूसरा वैज्ञानिक कारण अब विषाणु से बचने के लिए शरीर के संपर्क से बचने को कहा है। यह सही है कि आपस में हाथ मिलाने के बदले अगर हम नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के विषाणु हम तक नहीं पहुंच सकता है।
* मान ले कि हमारे सामने वाले को स्वाइन फ्लू है,
तब भी नमस्ते करने से हम बचे रह सकेंगे। वेदों में भी सभी उम्र के लिए एक ही अभिवादन बताया है। यहां तक कि ब्राह्मण के लिए भी नमस्ते शब्द ही आया है।
जैसे - " नमो ब्रह्मणे नमस्ते" 
हाथ जोड़कर, सिर झुकाना यानी हमारी क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति आप के अधीन है ।पहले साष्टांग प्रणाम बाद में पैर झुकाकर प्रणाम का चलन का वैज्ञानिक महत्व तथा शरीर की रचना पांच तत्वों से मानी जाती है ।इन पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व हमारे हाथ पैरों के उंगली अंगूठे करते हैं ।पांचों तत्वों की अलग-अलग नाड़ियां होती है।

एक से अनेक होते- होते इन पांच तत्वों का ऐसा विशाल तंत्र बन जाता है। जो शरीर के रोम -रोम तक पहुंच जाता है।हम कह सकते हैं कि शरीर में जितने रोम-लोम होते हैं,उतने ही नाड़ी का प्राण-पथ  होता है।पूर्ण स्वस्थ शरीर में इन सभी में करंट रहता है।
 आयु के साथ शरीर में अग्नि बंद हो जाती है अतः इनमें बढ़ने वाला करंट भी कमजोर पड़ता जाता है। 
अग्नि के दो रूप ताप और प्रकाश होता है जिसे विद्युत कहा जा सकता है विद्युत वितरण के इस विशाल तंत्र में सभी शार्ट सर्किट नहीं होता है ,उंगली -अंगूठे से बने विभिन्न मुद्राएं का इसलिए महत्व है ,क्योंकि यह पूर्णता विज्ञान सम्मत है शरीर के किसी भाग पर अपनी अंगुली या हाथ रख देने पर वहां विद्युत प्रवाह बढ़ जाता है।  विशेषत यह विद्युत सपनन्दन स्वास्थ्य लाभ ही करवाता है ,या इसलिए संभव हो पाता है ,क्योंकि पांचों तत्वों की नाड़ियां घालमेल से अलग होती हैं मुद्रा विज्ञान में पंचतत्व को हमारे हाथ की उंगली अंगूठे में प्रतिनिधित्व माना जाता है ।

ठीक इसी तरह पंचकोशी का संबंध भी अंगुली का अंगूठों से माना जा सकता है ।आनंदमय कोष ठंडक एवं जल का प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार तर्जनी प्राणमय कोष एवं अग्नि मध्यमा तन्मय कोष एवं आकाश तर्जनी प्राणमय कोष एवं वायु तथा अंगूठा एवं पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।


इसी को मध्य नजर रखते हुए हमारी परंपरा भी यही है कि जब भी आप किसी से मिले तो सामने वाले को नमस्ते जरूर करें।

आशुतोष उपाध्याय 
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